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आओ भूखमरी के खिलाफ जंग करें।

October 18, 2019 04:50 PM

 

भारत असंख्य विविधताएं लिए विरोधाभासों का देश है। विश्व की सबसे बड़ी जनतंत्र व्यवस्था तथा आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था अति महत्वपूर्ण आवधारणाओं व मापदंडो पर फिसलती जा रही है। हाल ही में जारी वैश्विक भूख सूचकांक अनुसार भारत, विश्व के 117 देशों, जिनमें रैंकिंग की गयी है, अन्तिम पंक्ति में 102वें पायदान पर खड़ा है। भूखमरी की समस्या तथा अपर्याप्त पोषण के कारण भारत दक्षिण एशिया में भी अपने पड़ोसी देशों - पाकिस्तान, बांग्लादेश से तो पीछे है ही, अफ्रीका के गरीब देशों के समकक्ष खड़ा है । युद्ध या आपदा पीडि़त राष्ट्र जैसे कि अफगानिस्तान, हयैति और येमन केवल भारत से इस मामले में पीछे हैं, 2010 में भारत इस सूचकांक में 95वें पायदान पर था तथा इस दृष्टि से निरंतर पिछड़ रहा है। भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा खाद्य पदार्थों के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है, देश में खाद्य सुरक्षा योजना भी चल रही है, फिर भी भूखमरी तथा कुपोषण जैसी समस्या गंभीर से गंभीरतम होती जा रही है। यह न केवल परेशानी का सबब है, अपितु राष्ट्रीय शर्म की बात है। निसंदेह बढ़ती जनसंख्या इसका सबसे बड़ा कारण है, पर यह समस्या न केवल वर्तमान की स्थिति को दिखाती है, अपितु भविष्य में आने वाली समस्याओं के बारे में बहुत कुछ कहती है। क्योंकि आज के बच्चे कल देश के कर्णधार बनेंगे । लेकिन यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि बच्चों का कम वजन उनके कद के अनुपात में भी एक समस्या बन गया है। वेस्टिंग नाप के इस मापदंड पर 2012 में इसकी भारत में कोई समस्या नहीं थी, अब यह बढ़कर 20 प्रतिशत हो गयी है । बच्चों में कुपोषण की समस्या इतनी तीव्र है कि भारतीय बच्चों का न केवल कद ही कम हो रहा है, अपितु उनका भार भी कम हो रहा है तथा दुबले पतले कदकाठी वाले बच्चे भारत की पहचान बनते जा रहे है । सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा मिड डे मील जैसे कदम प्रभावशाली बनाकर भूख से निपटने के लिए सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए । इस दिशा में सार्थक तथा सक्षम प्रयास किये जाने चाहिए अन्यथा यह समस्या हमारे आर्थिक विकास के बढते कदमों में जंजीर का काम करेगी । भूखा व्यक्ति रोटी चाहता है न कि वोट का अधिकार। भूखा व्यक्ति रोटी चाहेगा न कि गुलाब का फूल। अर्थात राजनैतिक स्वतंत्रता या सांस्कृतिक विकास मानवीय उत्थान के क्रम में मूलभूत न्यूनतम शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद आते हैं, अर्थात ‘‘पेट न पइया रोटियां, ते सबे गलां खोटिया’’ या यूं कहिए कि ‘‘भूखे भजन न होई गोपाला, ये लो अपनी कंठी माला’’। यह भूखमरी तथा कुपोषण की समस्या देश में फैली आर्थिक विषमताओं को भी परिलक्षित करती है। एक तरफ देश में मोटापे तथा बढ़ती डाइबीटिज की समस्या बढ़ती जा रही है,तो दूसरी तरफ अभावों की दुनिया में पल रहे बच्चे न केवल गोद में आने से पहले ही मर जाते है, पर यदि बच भी जाते है तो पूर्ण खाना न मिलने के कारण उनका शारीरिक व मानसिक विकास कुंठित हो रहा है। हंगर रिपोर्ट बताती है कि 2 साल से 7 साल के बच्चों में से 90 प्रतिशत बच्चों को न्यूनतम सम्पूर्ण स्वीकार्य भोजन नहीं मिल पाता जबकि यह भी एक वैज्ञानिक तथ्य है कि बच्चे के दिमाग का विकास पहले दो सालों में ही हो जाता है ।

‘‘सबका साथ और सबका विकास’’ ही देश को इस गंभीरतम समस्या से निजात दिला सकता है। पर केवल नारेबाजी या शब्दों से तो पेट नहीं भरता, सरकार को इस समस्या के गंभीर परिणामों को देखते हुए चेतने की जरूरत है । समाजिक सुरक्षा के दायरे को बड़ा करते हुए देश के गरीबों, वंचितों तथा सीमान्त अर्थात अन्तिम पंक्ति में खड़े लोगों के लिए, सब को चाहे उद्योगपति अपने करपोरेट सोशल रिसपान्सीबिजिटी के अंतर्गत करे, एन.जी.ओ तथा सरकार सबको इस समस्या से जूझना होगा तथा निदान के लिए आगे आना होगा, क्योंकि ये हमारे देश के उज्ज्वल व उन्नत भविष्य पर बहुत प्रश्न चिह्न लगाती है । जब तक ‘‘सब में भारत और भारत में सब’’ समावेशी दृष्टिकोण नहीं अपनाया जाएगा, तब तक भूखमरी, बीमारी, अशिक्षा जोकि गरीबी की पैदाइश है, दूर न की जा सकेगी । अंत में दुष्यंत कुमार की ये पंक्तिया -

‘‘ये सारा जिस्म झुक कर, बोझ में दुगना हुआ होगा,

मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा

डा.क.कली

 

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