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Haryana

मोदी मैजिक के साथ जाट-गैर जाट के मुद्दे से फतह किया हरियाणा

May 24, 2019 06:43 AM

courtesy  NBT MAY 24

मोदी मैजिक के साथ जाट-गैर जाट के मुद्दे से फतह किया हरियाणा


हाथ मरोड़ा• पूर्व सीएम हुड्डा के अलावा, पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा, हुड्डा सरकार में मंत्री अजय यादव से लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को भी हार देखनी पड़ी
बीजेपी की इस जीत में मोदी सरकार के कामकाज के अलावा खट्टर सरकार के कामकाज को भी अहम माना जा रहा है। खट्टर सरकार ने पिछले कुछ अर्से में जिस तरह से सरकारी नौकरियों में निष्पक्षता दिखाई, उसका सीधा असर जमीन पर दिखाई दिया। लोगों में भरोसा जागा कि बिना जेब गर्म किए भी प्रतिभा और मेरिट के आधार पर नौकरी मिल सकती है।
Manjari.Chaturvedi@timesgroup.com• नई दिल्ली : हरियाणा में पिछली बार बीजेपी को राज्य की दस में से नौ सीटें मिली थीं, इस बार भी बीजेपी अपनी वही टैली दोहराती दिख रही है। जबकि एक सीट पर कांटे की टक्कर दिखाई दी। पूरे देश की तरह हरियाणा में मोदी मैजिक दिखाई दिया। हालांकि पिछले पांच सालों में जिस तरह से जाट और गैरजाट की भावना गहराती दिखाई दी, उसने राज्य में बीजेपी को यह प्रचंड जीत दिलााई है।

चुनाव में कांग्रेस के तमाम बड़े नेता भी धराशायी होते दिखाई दिए। पूर्व सीएम हुड्डा के अलावा, पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा, हुड्डा सरकार में मंत्री अजय यादव से लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को भी हार देखनी पड़ी। हरियाणा एक ऐसा राज्य है, जहां इस बार लगभग हर सीट पर पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाते उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन बीजेपी की इस एकतरफा जीत में सभी बड़े-बड़े नाम अपना साख बचाते दिखे। जहां प्रदेश में जाट नेताओं में सबसे बड़ा नाम और प्रदेश के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा हार गए, वहीं देवीलाल के परिवार के चौटाला परिवार के तमाम चेहरे दुष्यंत सिंह चौटाला, दिग्विजय सिंह चौटाला, अर्जुन चौटाला को हार का मुंह देखना पड़ा। वहीं दूसरी ओर पूर्व सीएम भजनलाल के पोते और कुलदीप विश्नोई के बेटे भव्य शर्मा को भी अपने ही गढ़ हिसार में हार का सामना करना पड़ा। जबकि पूर्व सीएम बंसीलाल के गढ़ भिवानी में उनकी अपनी पोती लीडर श्रुति चौधरी हार गईं।

हरियाणा में बीजेपी की इस जीत के पीछे कहीं न कहीं समाज में जाट बनाम गैर जाट भाव का भीतर तक उतरना रहा। पंद्रह सालों तक लगातार जाट राज में रहे हरियाणा ने डेढ़ दशक तक जाटों का बाहुबल और उनका आतंक देखा था। भजनलाल के रूप में उन्हें कहीं न कहीं उस राज से मुक्ति मिली थी। लेकिन उसके बाद जब फिर से जाट राज आया तो गैर जाटों में यह भावना और तीव्र होती गई। उसके बाद जब सीएम मनोहरलाल खट्टर के रूप में उन्हें एक गैर जाट नेतृत्व मिला तो उन्होंने उन्हें हाथों हाथ लिया।

 
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