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Haryana

क्या सशर्त दिया जा सकता है विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से त्यागपत्र?

March 24, 2019 06:31 PM

चंडीगढ़ -  गत शनिवार हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के नेता  अभय सिंह चौटाला द्वारा अपने पद से त्यागपत्र देने बाबत घोषणा की गयी परन्तु इसके साथ-साथ ही लिखित तौर पर स्पीकर (अध्यक्ष)  से  इनेलो विधायक दल  के पांच मौजूदा बागी  विधायकों के विरूद्ध  दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्यवाही करते हुए उन्हें सदन की सदस्यता से अयोग्य करने की गुहार भी की गयी. अब प्रश्न यह उठता है कि क्या विधायिका के  किसी पद से क्या सशर्त इस्तीफ़ा दिया जा सकता है ? पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार का मानना है कि अगर कोई विधायक सदन में अपनी सदस्यता अथवा किसी अन्य पद को स्वैच्छिक तौर पर छोड़ना चाहता है तो उसे ऐसा बिना किसी शर्त के करना होता है अन्यथा  वह त्यागपत्र स्पीकर द्वारा मंजूर नहीं किया जाता. उन्होंने   बताया कि सदन में विपक्ष के नेता का दर्जा माननीय स्पीकर महोदय द्वारा प्रदान किया जाता है. हालांकि  विपक्ष के नेता के लिए हरियाणा विधानसभा द्वारा अलग से  कोई कानून नहीं बनाया गया है परन्तु  इस  पद का दर्जा, वेतनमान एवं अन्य सुविधाओं में प्रदेश के कैबिनेट मंत्री के समकक्ष ही रखा गया है. उन्होंने बताया  कि चूँकि अक्टूबर,2014  में हुए हरियाणा विधानसभा चुनावो में इनेलो पार्टी को 19  सीटें प्राप्त हुई थी जो भाजपा की तत्कालीन निर्वाचित सदस्य  संख्या 47  के बाद सबसे अधिक  थी, इसलिए इनेलो विधायक दल के नेता अभय चौटाला को नेता प्रतिपक्ष का पद स्पीकर द्वारा  दिया गया. अब इस सम्बन्ध में अभय चौटाला अगर चाहे तो  विधानसभा स्पीकर को ही अपना त्यागपत्र सौंप  सकते है, राज्यपाल महोदय तो नहीं परन्तु अगर वो ऐसा करने को  गंभीर है को ऐसा उन्हें बिना किस शर्त के करना पड़ेगा. इसमें पांच बागी पार्टी विधायकों को अयोग्य करने की शर्त नहीं होनी चाहिए. ज्ञात रहे कि होली के दिन  हरियाणा में हिसार ज़िले के नलवा विधानसभा हलके  से इनेलो पार्टी के मौजूदा विधायक रणबीर सिंह गंगवा  भाजपा में शामिल हो गए  परन्तु उनके द्वारा अपनी विधानसभा सदस्यता  से इस्तीफ़ा  नहीं दिया गया. इससे पहले  इनेलो पार्टी में पिछले वर्ष दिसंबर में  हुए  विभाजन  के फलस्वरूप, जिससे सदन में उनके तत्कालीन  इनेलो  विधायक दल में से  चार विधायक पहले ही बागी   हो गए  एवं उन्होने इनेलो में  टूट के बाद बनायीं गयी  जननायक जनता पार्टी-(जे.जे.पी.)-जजपा  को अपना खुला समर्थन दे दिया, इससे भी अभय चौटाला के  सदन में नेता प्रतिपक्ष के  पद पर कायम रहने पर  द्वारा गंभीर प्रश्न उठाये जा रहे हैं.  पिछले कुछ  महीनो में जब उनकी पार्टी के दो विधायकों  की मृत्यु के कारण उनकी पार्टी की सदस्यता संख्या 17 हो गई एवं  जिसमे से अब पांच विधायक बागी भी हो गए है, अत: ऐसी परिस्थिति में अभय चौटाला के पास दो ही विकल्प बचे थे, या तो वह सदन में यथास्थिति बरक़रार रखते   एवं बागी विधायकों  के विरूद्ध उन्हें सदन से अयोग्य घोषित करवाने बाबत  कोई  कार्यवाही न प्रारम्भ   करते जिससे  संभवत: उनके वर्तमान  नेता प्रतिपक्ष के  पद पर कोई खतरा नहीं आता  या  फिर वो उक्त पांचो विधायकों के विरूद्ध पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त होने के कारण एवं दल-बदल करने के आधार पर उन्हें सदन की सदस्यता से अयोग्य करवाने के लिए स्पीकर को याचिकाएं सौंपने का निर्णय लेते.  हालांकि नेता प्रतिपक्ष के पद से त्यागपत्र देने  को बागी विधायकों को सदन की सदस्यता से अयोग्य करवाने की याचिकाओं के साथ नहीं जोड़ना चाहिए. पिछले वर्ष 2018  के अंत में  अभय चौटाला के  बड़े  भाई अजय चौटाला और उनके दो पुत्रो हिसार से लोकसभा सांसद दुष्यंत चौटाला और इनसो अध्यक्ष  दिग्विजय चौटाला को   इनेलो पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था जिसके बाद  उन्होंने अलग होकर अपनी अलग पार्टी जननायक जनता पार्टी (जजपा)   बना ली  जिसमे अजय चौटाला की पत्नी, नैना सिंह चौटाला, जो  सिरसा जिले की  डबवाली सीट से मौजूदा इनेलो विधायक हैं, भी शामिल है एवं उन्हें तीन  अन्य वर्तमान इनेलो विधायकों - दादरी से राजदीप फौगाट, उकलाना से अनूप धानक एवं नरवाना से पिरथी सिंह नंबरदार  का भी  समर्थन प्राप्त हैं. हालांकि नैना एवं उनके तीन  समर्थक  विधायकों ने इस सम्बन्ध में  आज तक सदन में  स्पीकर को अपने को इनेलो विधायक दल से अलग करने बाबत स्वयं लिख कर दिया  है क्योंकि अगर वो ऐसा करते तो  भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची अर्थात दल बदल विरोधी कानून के तहत वह  चारो हरियाणा विधानसभा की सदस्यता  से  हाथ धो सकते थे. ऐसा इसलिए क्योकि  स्वैच्छिक तौर पर सदन में अपनी मूल पार्टी छोड़ना दलबदल करने की परिभाषा के तहत ही आता है.  रणबीर गंगवा ने भी  चूँकि भाजपा में शामिल होने पर इनेलो पार्टी के विधायक के तौर पर विधानसभा सदस्यता से त्यागपत्र नहीं दिया तो उन पर भी दल बदल विरोधी कानून का वही पैमाना लागू होता है.  हेमंत ने बताया आज से ग्यारह वर्ष पूर्व 2008  में  तत्कालीन मुख्यमंत्री हरियाणा भूपिंदर हूडा के शासनकाल में  सत्तारूढ़  कांग्रेस पार्टी द्वारा अपने तत्कालीन तीन पार्टी  विधायकों - भजन लाल, राकेश कम्बोज एवं धर्मपाल मालिक को सदन से ऐसे ही दल-बदल कानून के तहत तत्कालीन स्पीकर रघुबीर सिंह कादियान  द्वारा  अयोग्य घोषित करवाया  गया था क्योंकि उन्होंने सदन से बाहर कांग्रेस  पार्टी से अलग होकर दिसंबर, 2007 में अपनी अलग पार्टी - हरियाणा जनहित पार्टी (बी.एल.) बना ली थी हालांकि उन तीनो में  सदन में अपने को कांग्रेस पार्टी से अलग नहीं किया था. हेमंत ने यह भी बताया की  कि  अगर इनेलो पार्टी द्वारा उक्त पांचो विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने पर उनके विरूद्ध अनुशासनात्मक   कार्यवाही की जाती जैसे उन्हें भी पार्टी से निष्कासित कर दिया जाता तो ऐसी स्थिति में  उनकी सदस्यता तभी जा सकती है जब वो सदन में पार्टी द्वारा जारी किये गए व्हिप का उलंघन करते हैं. ऐसा ही लोक सभा संसद दुष्यंत चौटाला पर पूर्णतया लागू होता है क्योंकि उनको तो इनेलो पार्टी पिछले वर्ष ही पार्टी से निष्कासित  कर चुकी है. चूँकि अब वर्तमान 16 वी लोक सभा का अब कोई और सत्र नहीं है एवं  अगले दो महीनो में यह स्वत: अपनी अवधि पूर्ण कर भंग  हो जायेगी अत: दुष्यंत की सदस्यता पर कोई  कोई संकट  नहीं है. बहरहाल, हेमंत ने बताया की अगर इनेलो पार्टी उक्त  पांचो विधायकों को  दल बदल कानून के तहत स्पीकर द्वारा सदन से  अयोग्य घोषित करवाने के लिए गंभीर है, तो इनेलो पार्टी को हरियाणा विधानसभा (दल-बदल के आधार पर अयोग्यता) नियम, 1987 के प्रावधानों का कड़ा पालन करते हुए इस सम्बन्ध में आगे बढ़ना चाहिए. केवल स्पीकर को पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव द्वारा हस्ताक्षरित पत्र लिखकर देने से ही बात नहीं बनेगी.  उक्त  नियमो के तहत बागी पांच विधायकों के विरूद्ध इनेलो पार्टी के कोई भी पांच अलग अलग विधायकों  या कोई  किसी एक विधायक, जिसे पार्टी द्वारा इस सम्बन्ध में अधिकृत किया गया हो, द्वारा  अलग अलग पांच याचिकाएं स्पीकर को विधानसभा सचिव के माध्यम से  सौंपी जा सकती हैं. अगर स्पीकर महोदय चाहे तो यह मामले सदन की विशेषाधिकार समिति को सौंप कर इस सम्बन्ध में समिति की इस मामले में  प्राथमिक रिपोर्ट देने को कह सकते है या अगर वो चाहें तो सीधे भी इस सम्बन्ध में निर्णय ले सकते है. दल-बदल मामलो में लगने वाले समय पर हेमंत ने बताया की यह स्पीकर के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है. वर्ष 2008 में तत्कालीन स्पीकर कादियान ने केवल कुछ महीनो में ही कांग्रेस के तीन विधायकों को अयोग्य घोषित  कर दिया था जबकि इसके विपरीत एक अन्य पूर्व स्पीकर कुलदीप शर्मा ने पांच हजका  विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने के मामले में सवा तीन वर्ष का समय लगा दिया था. वर्तमान हरियाणा विधानसभा की अवधि इस वर्ष 2 नवंबर, 2019 तक है एवं इस दौरान कम से कम सदन का एक सत्र इस वर्ष अगस्त माह में होना निश्चित  है बशर्ते कि इससे पहले और आगामी लोक सभा चुनावो के तुरंत बाद हरियाणा विधानसभा को सत्तासीन  खट्टर सरकार द्वारा  समय पूर्व  भंग न करवा दिया  जाए जैसा कि आज से नौ वर्ष पूर्व अगस्त, 2009 में तत्कालीन हूडा सरकार द्वारा किया गया था. हालांकि हेमंत ने बताया की दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित होने के बावजूद वर्तमान नियमो के अनुसार सम्बंधित विधायकों को पूर्व विधायक के तौर पर दी जाने वाली पेंशन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.



 
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