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Haryana

हरियाणा विधानसभा स्पीकर द्वारा 1987 में बनाये गए दल-बदल विरोधी नियमो के अंतर्गत पार्टी बागियों पर कार्यवाही हो सकती है - एडवोकेट हेमंत

March 23, 2019 10:00 PM

चंडीगढ़ - आज शनिवार हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के नेता  अभय सिंह चौटाला द्वारा अपने पद से त्यागपत्र देने का निर्णय लिया गया  एवं इसके साथ  इनेलो विधायक दल  के पांच मौजूदा बागी  विधायकों के विरूद्ध विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर उन्हें दल-बदल विरोधी कानून के तहत सदन की सदस्यता से अयोग्य करने की गुहार भी की गयी है. ज्ञात रहे कि होली के दिन  हरियाणा में हिसार ज़िले के नलवा विधानसभा हलके  से इनेलो पार्टी के मौजूदा विधायक रणबीर सिंह गंगवा  भाजपा में शामिल हो गए  परन्तु उनके द्वारा अपनी विधानसभा सदस्यता  से इस्तीफ़ा  नहीं दिया गया. अगर वो ऐसा करते हैं, तो इससे सदन में इनेलो पार्टी के विधायकों की सदस्य संख्या मौजूदा 17 से  घटकर 16 रह जायेगी  जो कि सदन में  कांग्रेस  विधायकों की एक समान मौजूदा संख्या 17  से एक कम हो जायेगी   जिससे कांग्रेस विधायक दल   सदन में प्रतिपक्ष के पद के लिए विधानसभा स्पीकर के समक्ष अपना दावा पेश कर सकता है. बहरहाल  चूँकि  विधायक गंगवा  द्वारा ऐसा नहीं किया गया इसलिए  उनके विरूद्ध इनेलो  पार्टी का विधायक रहते हुए भाजपा में शामिल होने पर  उन्हें  दल-बदल विरोधी  कानून के तहत  विधानसभा  सदस्यता से अयोग्य करने की गुहार की गई है. इससे पहले  इनेलो पार्टी में पिछले वर्ष दिसंबर में  हुए  विभाजन  के फलस्वरूप, जिससे सदन में उनके तत्कालीन  इनेलो  विधायक दल में से  चार विधायक पहले ही बागी   हो गए  एवं उन्होने इनेलो में  टूट के बाद बनायीं गयी  जननायक जनता पार्टी-(जे.जे.पी.)-जजपा  को अपना खुला समर्थन दे दिया, इससे भी अभय चौटाला के  सदन में नेता प्रतिपक्ष के  पद पर कायम रहने पर  गत माह फरवरी में बुलाये गए बजट सत्र में भाजपा के वरिष्ठ मंत्री अनिल विज  और  पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर हूडा एवं अन्य विधायकों  द्वारा गंभीर प्रश्न उठाये गए थे.   बहरहाल, इस सबके बीच पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने  बताया कि सदन में विपक्ष के नेता का दर्जा माननीय स्पीकर महोदय द्वारा प्रदान किया जाता है. हालांकि हरियाणा  विपक्ष के नेता के लिए अलग रूप से हरियाणा विधानसभा द्वारा  कोई कानून नहीं बनाया गया है एवं उनके पद का दर्जा वेतनमान एवं अन्य सुविधाओं में प्रदेश के कैबिनेट मंत्री के समकक्ष रखा गया है. उन्होंने बताया  कि चूँकि अक्टूबर,2014  में हुए हरियाणा विधानसभा चुनावो में इनेलो पार्टी को 19  सीटें प्राप्त हुई थी जो भाजपा की तत्कालीन  संख्या 47   के बाद सबसे अधिक अर्थात 19 थी, इसलिए इनेलो विधायक दल के नेता अभय चौटाला को नेता प्रतिपक्ष का पद स्पीकर द्वारा  दिया गया. अब इस सम्बन्ध में अभय चौटाला स्पीकर को ही अपना त्यागपत्र दे  सकते है. पिछले कुछ  महीनो में जब उनकी पार्टी के दो विधायकों  की मृत्यु के कारण उनकी पार्टी की सदस्यता संख्या 17 हो गई एवं  जिसमे से पांच विधायक बागी भी हो गए है, अत: अभय चौटाला के पास दो ही विकल्प बचे थे, या तो वह सदन में यथास्थिति बरक़रार रखते एवं बागी विधायकों  के विरूद्ध उन्हें सदन से अयोग्य घोषित करवाने की  कार्यवाही न करते जिससे उनके वर्तमान   नेता प्रतिपक्ष के   पद पर कोई खतरा न आता या फिर वो उक्त पांचो विधायकों के विरूद्ध पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त होने के कारण उन्हें सदन की सदस्यता से अयोग्य करवाने के लिए स्पीकर को याचिकाएं सौंपने का निर्णय लेते, जैसे उन्होंने अब किया है. गत वर्ष  2018  के अंत में अभय चौटाला  के बड़े  भाई अजय चौटाला और उनके दो पुत्रो हिसार से लोकसभा सांसद दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला ने  इनेलो पार्टी से अलग होकर अपनी अलग पार्टी जजपा   बना ली थी जिसमे अजय चौटाला की पत्नी, नैना सिंह चौटाला, जो  सिरसा जिले की  डबवाली सीट से मौजूदा इनेलो विधायक हैं, भी शामिल है एवं उन्हें तीन  अन्य वर्तमान इनेलो विधायकों - दादरी से राजदीप फौगाट, उकलाना से अनूप धानक एवं नरवाना से पिरथी सिंह नंबरदार  का भी  समर्थन प्राप्त हैं. हालांकि नैना एवं उनके तीन  समर्थक  विधायकों ने इस सम्बन्ध में  आज तक सदन में  स्पीकर को अपने को इनेलो विधायक दल से अलग करने बाबत स्वयं लिख कर दिया  है क्योंकि अगर वो ऐसा करते तो  भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची अर्थात दल बदल विरोधी कानून के तहत वह  चारो हरियाणा विधानसभा की सदस्यता  से  हाथ धो सकते थे  क्योंकि स्वैच्छिक तौर पर सदन में अपनी मूल पार्टी छोड़ना दलबदल करने की परिभाषा के तहत ही आता है.  रणबीर गंगवा ने  चूँकि भाजपा में शामिल होने पर इनेलो पार्टी के विधायक के तौर पर विधानसभा सदस्यता से त्यागपत्र नहीं दिया तो उन पर भी दल बदल विरोधी कानून का वही पैमाना लागू होता है.  हेमंत ने बताया आज से ग्यारह वर्ष पूर्व 2008  में  तत्कालीन मुख्यमंत्री हरियाणा भूपिंदर हूडा के शासनकाल में  सत्तारूढ़  कांग्रेस पार्टी द्वारा अपने तत्कालीन तीन पार्टी  विधायकों - भजन लाल, राकेश कम्बोज एवं धर्मपाल मालिक को सदन से ऐसे ही दल-बदल कानून के तहत तत्कालीन स्पीकर रघुबीर सिंह कादियान  द्वारा  अयोग्य घोषित करवाया  गया था क्योंकि उन्होंने सदन से बाहर कांग्रेस  पार्टी से अलग होकर दिसंबर, 2007 में अपनी अलग पार्टी - हरियाणा जनहित पार्टी (बी.एल.) बना ली थी हालांकि उन तीनो में  सदन में अपने को कांग्रेस पार्टी से अलग नहीं किया था. हेमंत ने यह भी बताया की  कि  अगर इनेलो पार्टी द्वारा उक्त पांचो विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने पर उनके विरूद्ध स्वयं कार्यवाही की जाती जैसे उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया जाता, तो शायद उनकी सदस्यता बच सकती थी क्योंकि वो स्पीकर के सामने यह प्रार्थन करते की उन्होंने स्वयं पार्टी नहीं छोड़ी बल्कि उन्हें पार्टी से निकला गया है. बहरहाल, हेमंत ने बताया की अगर इनेलो पार्टी इन पांचो को  दल बदल कानून के तहत स्पीकर द्वारा सदन से  अयोग्य घोषित करवाने के लिए गंभीर है, तो इनेलो पार्टी को हरियाणा विधानसभा (दल-बदल के आधार पर अयोग्यता) नियम, 1987 के प्रावधानों का कड़ा पालन करते हुए इस सम्बन्ध में आगे बढ़ना चाहिए. इन नियमो के तहत बागी पांच विधायकों के विरूद्ध इनेलो पार्टी के कोई भी पांच अलग अलग  विधयकों या कोई  एक विधायक, जिसे पार्टी द्वारा इस सम्बन्ध में अधिकृत किया गया हो, द्वारा  अलग अलग पांच याचिकाएं स्पीकर को विधानसभा सचिव के माध्यम से  सौंपी जा सकती हैं. अगर स्पीकर महोदय चाहे तो यह मामले सदन की विशेषाधिकार समिति को सौंप कर इस सम्बन्ध में समिति की प्राथमिक रिपोर्ट देने को कह सकते है या सीधे भी इस सम्बन्ध में निर्णय ले सकते है. दल-बदल मामलो में लगने वाले समय पर हेमंत ने बताया की यह स्पीकर के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है. वर्ष 2008 में तत्कालीन स्पीकर कादियान ने केवल कुछ महीनो में ही कांग्रेस के तीन विधायकों को अयोग्य घोषित  कर दिया था जबकि इसके विपरीत एक अन्य पूर्व स्पीकर कुलदीप शर्मा ने पांच हजका  विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने के मामले में सवा तीन वर्ष का समय लगा दिया था. वर्तमान हरियाणा विधानसभा की अवधि इस वर्ष 2 नवंबर, 2019 तक है एवं इस दौरान कम से कम सदन का एक सत्र इस वर्ष अगस्त माह में होना निश्चित  है बशर्ते कि इससे पहले और आगामी लोक सभा चुनावो के तुरंत बाद हरियाणा विधानसभा को सत्तासीन  खट्टर सरकार द्वारा  समय पूर्व  भंग न करवा दिया  जाए जैसा कि आज से नौ वर्ष पूर्व अगस्त, 2009 में तत्कालीन हूडा सरकार द्वारा किया गया था. 

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