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Editorial

NBT EDIT-खुशहाल देशों की सूची में भारत और नीचे इतने बेचैन क्यों

March 23, 2019 06:22 AM

COURTESY NBT MARCH 23

खुशहाल देशों की सूची में भारत और नीचे
इतने बेचैन क्यों

 

वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट 2019
यह वाकई चिंता की बात है कि प्रसन्न समाजों की सूची में पहले ही काफी नीचे चल रहा हमारा देश अभी थोड़ा और नीचे खिसक गया है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट 2019 में भारत का स्थान 140वां है जबकि पिछले साल वह 133वें स्थान पर था। पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित अपने ज्यादातर पड़ोसी समाजों से कम खुश है भारतीय समाज। रिपोर्ट में फिनलैंड को लगातार दूसरे साल सबसे खुशहाल देश का तमगा मिला, इसके बाद नॉर्वे और डेनमार्क का नाम है। खुशहाली के मामले में सबसे अंतिम पायदान पर बुरुंडी का नाम है। इस सूचकांक के लिए अर्थशास्त्रियों की एक टीम समाज में सुशासन, प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य, जीवित रहने की उम्र, भरोसा, सामाजिक सहयोग, स्वतंत्रता और उदारता आदि को आधार बनाती है। रिपोर्ट का मकसद विभिन्न देशों के शासकों को आईना दिखाना है कि उनकी नीतियां लोगों की जिंदगी खुशहाल बनाने में कोई भूमिका निभा रही हैं या नहीं। जहां तक भारत का प्रश्न है, पिछले कुछ समय से भारतीय अर्थव्यवस्था की तेजी को पूरी दुनिया ने स्वीकार किया है। अनेक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संगठनों ने इस मामले में हमारी पीठ ठोकी है। यही नहीं, खुद संयुक्त राष्ट्र ने मानव विकास के क्षेत्र में भारतीय उपलब्धियों को रेखांकित किया है। बावजूद इसके, खुशहाली में हमारा मुकाम इतना नीचे होना हैरत में डालता है। दरअसल पिछले दो-ढाई दशकों में भारत में विकास प्रक्रिया अपने साथ हर मामले में बहुत ज्यादा विषमता लेकर आई है। जो पहले से समर्थ थे, वे इस प्रक्रिया में और ताकतवर हो गए हैं। यानी लखपति करोड़पति हो गए और करोड़पति अरबपति बन गए। एकदम साधारण आदमी का जीवन भी बदला है लेकिन कई तरह की नई समस्याएं उसके सामने आ खड़ी हुई हैं। आर्थिक प्रक्रिया में सरकार की भूमिका काफी कम हुई है। अपनी भूमिका को वह उतने तक ही सीमित रखती है, जितनी अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए उसे जरूरी लगती है। जैसे अत्यंत निर्धनों के लिए जो योजनाएं बनी हैं, उनका जोर उस वर्ग को किसी तरह जिंदा रखने पर है। उनको उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की कोई कोशिश नहीं हो रही है। वह वर्ग भुखमरी से तो उबर गया है मगर शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय उसकी पहुंच से बाहर है। इससे ठीक ऊपर वाले बड़े तबके को तो सरकारी मदद लायक भी नहीं माना जाता। ऐसे लोगों के जीवन में खुशी भला कहां से आएगी/ जाहिर है, इस रिपोर्ट से जीडीपी ग्रोथ जैसे आंकड़े व्यर्थ लगने लगते हैं। इस सिलसिले में अकेली सकारात्मक बात यह है कि हैपिनेस इंडेक्स से सामाजिक प्रसन्नता विमर्श का हिस्सा बनी है और लोग ‘प्रति व्यक्ति आय’ की चकाचौंध से बाहर आ रहे हैं। विकास की सार्थकता इस बात में है कि देश का आम नागरिक खुद को संतुष्ट और आशावान महसूस करे।

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