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काले धन को पवित्र बनाने का सियासी खेल-चुनावी बॉन्डों के जरिए कोई भी पार्टी किसी भी कंपनी से बेहिसाब चंदा ले सकती है

December 05, 2018 05:50 AM

COURTESY NBT DEC 5

अजेय कुमार
वित्त मंत्री ने चुनावी बॉन्डों के प्रावधान की सूचना देते हुए कहा कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और पॉलिटिकल फंडिंग की व्यवस्था साफ-सुथरी होगी
चुनावी बॉन्डों के जरिए कोई भी पार्टी किसी भी कंपनी से बेहिसाब चंदा ले सकती है
काले धन को पवित्र बनाने का सियासी खेल
Uday Deb
भारत का साधारण आदमी अपने अनुभव से जानता है कि चुनाव में जिन उम्मीदवारों और पार्टियों के पास ज्यादा आर्थिक ताकत होती है, उनके जीतने की संभावना बढ़ जाती है। प्रायः यह देखा गया है कि भ्रष्टाचार में लिप्त बड़ी-बड़ी कंपनियां या व्यक्ति अपना काला धन चुनाव के समय राजनीतिक पार्टियों को इस उम्मीद में सौंप देते हैं कि चुनाव के बाद उनके हितों का विशेष ध्यान रखा जाएगा। चुनावी फंडिंग का मुद्दा दरअसल सरकार द्वारा लागू की जाने वाली आर्थिक नीतियों से सीधे जुड़ा है। सरकार में आई पार्टी इसके प्रभाव में आकर नियमों में ढील देने को मजबूर हो जाती है। फंड देने वाले कॉरपोरेट घराने नियमन कर्ताओं को अपनी जेब में रखते हैं। और अगर वे मीडिया से संबंधित हों तो आम नागरिकों के विचारों को इस तरह बदलने में कामयाब हो जाते हैं कि आम जनता सरकार द्वारा उठाये जा रहे ‘कठोर कदमों’ को ‘जनहित’ में देखने लगती है। • कोई सीमा नहीं

अक्सर देखा जा रहा है कि कुछ मीडिया घराने उन मीडियाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखाने में देर नहीं लगा रहे, जो सच के पक्ष में खड़े होकर सरकार की आलोचना करते हैं। इसलिए कोई भी ईमानदार सरकार पत्रकारिता में दखलंदाजी, घूसखोरी और संस्थागत भ्रष्टाचार को कम करने के लिए चुनाव में बड़ी पूंजी की भूमिका को नियंत्रित रखना चाहेगी। दुर्भाग्यवश हमारे देश में कंपनियों पर लागू वह पाबंदी भी एक वित्त विधेयक के जरिए खत्म कर दी गई है, जिसके तहत वे अपने पिछले तीन सालों के औसत शुद्ध मुनाफे का 7.5 प्रतिशत हिस्सा ही फंड के रूप में राजनीतिक पार्टियों को दे सकती थीं। अभी तो वे इस मद में जितना चाहे, उतना खर्च कर सकती हैं। एच डी देवगौड़ा के प्रधानमंत्रित्व काल में इंद्रजीत गुप्ता कमेटी ने सिफारिश की थी कि चुनाव में उम्मीदवारों को ‘न्यूनतम वित्तीय आधार’ प्रदान करने के लिए आंशिक सरकारी फंडिंग का प्रावधान होना चाहिए।

कई देशों में ऐसी व्यवस्था पहले से मौजूद है। हमारे यहां भी ऐसा किया जाना चाहिए। मगर हमारे यहां होगा यह कि उम्मीदवारों की कॉरपोरेट फंडिंग पर कोई रोक न होने की मौजूदा स्थिति में सरकारी खजाने से मिलने वाली सहायता उम्मीदवारों के संसाधनों का एक और स्रोत बनकर रह जाएगी। इसलिए पहले कॉरपोरेट फंडिंग पर नियंत्रण करना जरूरी है। भ्रष्टाचार मुक्त भारत के चुनावी वादे से आई बीजेपी सरकार ने हाल में चुनावी बॉन्डों के जरिए राजनीतिक पार्टियों के लिए चंदा जुटाने का प्रस्ताव रखा है। चुनावी बॉन्ड एक रुक्के के रूप में बीयरर बांड है और इसे जारी करने का अधिकार स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चुनिंदा ब्रांचों को दिया गया है। ये बॉन्ड एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ रुपयों में उपलब्ध हैं और ये 15 दिनों के लिए मान्य होंगे। जिन पंजीकृत राजनीतिक पार्टियों को राज्य में या आम चुनावों में कुल मत का एक प्रतिशत मत प्राप्त हुआ हो, वे इन बॉन्ड्स के जरिये धन ले सकती हैं।

सरकार ने यह भी कहा है कि किसी राजनीतिक पार्टी को खुलासा करने की भी आवश्यकता नहीं है कि उसने यह धन किससे प्राप्त किया है। न ही किसी कॉरपोरेट घराने या अमीर आदमी को यह बताने की जरूरत है कि उसने यह धन किस राजनीतिक पार्टी को दिया है। यह फंडिंग केवल देसी कॉरपोरेट कंपनियां ही नहीं, विदेशी कंपनियां भी कर सकती हैं। सबसे मजेदार बात यह है कि वित्त मंत्री ने चुनावी बॉन्डों के प्रावधान की सूचना देते हुए कहा कि इससे अधिक पारदर्शिता आएगी और राजनीतिक फंडिंग की व्यवस्था साफ-सुथरी होगी। जबकि सचाई यह है कि इस व्यवस्था से राजनीतिक पार्टियों के लिए असीमित तथा अनाम कॉरपोरेट और विदेशी फंडिंग के दरवाजे खोल दिए गए हैं। हमारे देश में चुनाव में पार्टियों के खर्च की कोई अधिकतम सीमा नहीं है। जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा-77 सिर्फ उम्मीदवारों के चुनाव खर्च पर अंकुश लगाती है। चुनावी बॉन्डों से एकत्र की गई धनराशि पार्टियां अब खुल्लम-खुल्ला खर्च कर सकती हैं क्योंकि इसमें स्रोत बताने की आवश्यकता ही नहीं है।

समझने की बात यह है कि चुनावी बॉन्ड के मुद्दे को आम चुनावों से ऐन पहले उछालने की ज़रूरत सरकार को क्यों आ पड़ी! हुआ यह है कि राफेल सौदे में एक कॉरपोरेट घराने का नाम उछल जाने के बाद सरकार के पास विपक्ष के हमले का कोई संतोषजनक जवाब नहीं था। शत्रुघ्न सिन्हा ने ठीक ही कहा है कि ‘अगर एक टेलीकॉम कंपनी को लड़ाकू जहाज बनाने की डील दी जा सकती है तो फिर ‘हल्दीराम’ को भी तोप के गोले बनाने का ऑर्डर मिलना चाहिए क्योंकि उसके पास तो ‘लड्डू’ बनाने का अनुभव भी है।’ रक्षा कार्य के लिए एक सरासर अयोग्य कंपनी का चुना जाना, निश्चित रूप से किसी लेन-देन की ओर इशारा करता है। शायद इस किस्म के ऊंचे स्तर के भ्रष्टाचार को वैधता प्रदान करने के लिए ही सरकार ने बॉन्ड की शक्ल में घूस के पैसे को लेना-देना कानूनी बना दिया है। चुनावी बॉन्डों से उसकी यह समस्या एक ही झटके में खत्म हो गई क्योंकि इस बारे में न लेने वाले को कुछ बताना जरूरी है, न देने वाले को। • लोकतंत्र पर खतरा

होगा सिर्फ यह कि जो रिश्वत पहले मेज के नीचे से दी जाती थी, वह अब कानूनी ढंग से दी जाएगी और इसमें जनता और देश के हितों की अनदेखी करते हुए ‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ के फार्मूले से शासक पार्टी और उसकी हितसाधक कॉरपोरेट कंपनियों, दोनों को फायदा होगा। विशेषकर तब, जब राजनीतिक पार्टियों को दिए गए चंदे सार्वजनिक पड़ताल से बाहर कर दिए गए हैं। इससे दरबारी पूंजीवाद के बेरोकटोक पनपने की स्थितियां तैयार होंगी। राजनीतिक पार्टियों और कॉरपोरेट घरानों की मिलीभगत राजनीतिक प्रक्रियाओं की संचालक बनकर अंततः जनतंत्र को कमजोर करेगी, लिहाजा भारत में वास्तविक लोकतंत्र के लिए चुनावी बॉन्डों की व्यवस्था वापस ली जानी चाहिए

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