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हरियाणा विधानसभा द्वारा पारित दंड-विधि (हरियाणा संशोधन) विधेयक, 2018 का हरियाणा सरकार द्वारा परित्याग करने सम्बन्धी सदन को न सूचित करने बारे एडवोकेट ने स्पीकर को याचिका सौंपी

November 22, 2018 11:55 AM

अगस्त को  भारत के महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित  दंड विधि (संशोधन) विधेयक, 2018  को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी जिससे पश्चात यह   ओपचारिक विधिवत कानून बन गया हालाकि यह पूरे भारत देश में इस वर्ष 21 अप्रैल से ही लागू हो गया था जिस दिन  केंद्र में सत्तारूढ़  मोदी सरकार ने इसे अध्यादेश के रूप में भारत के राष्ट्रपति महोदय द्वारा  जारी करवाया था . इसी के दृष्टिगत हरियाणा की सत्तारूढ़ मनोहर लाल सरकार ने  इस वर्ष  15  मार्च 2018 को हरियाणा विधानसभा के बजट सत्र के दौरान  पारित किये गए दंड-विधि (हरियाणा संशोधन) विधेयक2018 का परित्याग करने और संसद द्वारा बनाये गए  उक्त कानून को ही अपनाने का फैसला किया क्योंकि हरियाणा द्वारा पारित उक्त  विधेयक में मोजूद बलात्कार/सामूहिक बलात्कार की सज़ा से  सम्बंधित कड़े किये गए प्रावधानों को संसद द्वारा पारित  कानून में न केवल सम्मिलित किया गया  है बल्कि इनको और भी सख्त बनाया  गया है. पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने बताया की यहाँ लिखने बात ध्यान देने योग्य  है कि हरियाणा विधानसभा द्वारा पारित उक्त विधेयक में हालाकि भारतीय दंड संहिता (IPC) के दो प्रावधान ऐसे संशोधित किये गए जो संसद द्वारा संशोधित कानून में नहीं है. एक तो IPC  की धारा 354 (लज्जा-भंग करना ) में वर्तमान वर्णित कारावास  सजा  को बढाकर दोनों में से किसी भी भांति का कम से कम दो वर्ष और अधिकतम सात वर्ष करने का फैसला लिया गया. अभी वर्तमान में  इसमें कम से कम एक वर्ष और अधिकतम पांच वर्ष के कारावास का प्रावधान है. इसके अतिरिक्त IPC कीधारा 354 D (2)  ( महिला का पीछा करना) में  भी दूसरी बार  एवं उसके अधिक बार दोषी पाए जाने पर दोनों में से किसी भांति के कारावास की अवधि अधिकतम सात वर्ष कर दी गयी है. अभी यह अधिकतम अवधि पांच वर्ष है. एडवोकेट हेमंत ने कहा की हरियाणा  विधानसभा द्वारा पारित  होने के बाद  दंड विधि (हरियाणा संशोधन ) विधेयक2018   हरियाणा के   राज्यपाल महोदय  के पास गया जहाँ से महामहिम द्वारा इस अप्रैल माह के आरम्भ  में इसे  केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को भेजा दिया गया ताकि इस पर भारत के राष्ट्रपति  महोदय की स्वीकृति ली जा सके क्योंकि दंड-विधि का विषय  भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत समवर्ती सूची में आता है. इसके बाद 21 अप्रैल 2018 को मोदी सरकार ने राष्ट्रपति महोदय द्वारा दंड विधि (संशोधन) अद्यादेश, 2018 जारी करवा दिया जिसके बाद केंद्रीय  गृह मंत्रालय ने इस वर्ष मई माह के आरम्भ में  हरियाणा सरकार को पत्र लिखकर पूछा  क्या उक्त जारी किये गये अध्यादेश के दृष्टिगत हरियाणा सरकार अपनी विधानसभा द्वारा पारित  दंड-विधि (हरियाणा संशोधन) विधेयक2018 का परित्याग करना  चाहती है. इसके दो माह बाद इस वर्ष जुलाई माह के आरम्भ में हरियाणा सरकार ने केन्द्रीय गृह मंत्रालय को इस बाबत पत्र भेजकर इस संबंध में अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी एवं  उक्त दंड-विधि (हरियाणा संशोधन) विधेयक2018 की मूल प्रतियाँ राज्य सरकार को वापिस भेजने की याचना की जिसे जुलाई माह के अंत में केद्रीय गृह मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया एवं इस बाबत हरियाणा के राज्यपाल कार्यालय को सूचित कर दिया जिसके बाद राजभवन द्वारा इस वर्ष अगस्त माह में राज्य सरकार को भी इस बाबत विधिवत जानकारी दे दी गयी. एडवोकेट हेमन्त ने बताया की की इसके बाद जब राज्य विधानसभा का मानसून सत्र इस वर्ष सितम्बर से प्रारंभ हुआ तो सदन को इस आशय में हरियाणा सरकार द्वारा आधिकारिक एवं ओपचारिक सूचना नहीं दी गयी जो कि अत्यंत खेदजनक है. हेमंत ने कहा की इस  सबके बीच यह प्रश्न उठता है कि क्या सदन को ओपचारिक रूप से उक्त विधेयक के वापिस लेने  बाबत सूचित करना राज्य सरकार का कर्त्तव्य नहीं था  उन्होंने आगे कहा कि प्रश्न यह भी उठता है कि क्या हरियाणा  सरकार राज्य विधानसभा द्वारा विधिवत रूप से पारित किसी विधेयक कोऐसी परिस्थिति में जबकि राज्यपाल या राष्ट्रपति महोदय ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किये हो, , चाहे किसी भी कारण के फलस्वरूपउसे अपने तौर पर ही वापिस लेने का निर्णय ले सकती है अथवा उसे सदन के समक्ष ऐसा परित्याग करने बाबत  विधिवत रूप से एक रेसोलुशन(प्रस्ताव) लाना पड़ेगा जिसे  सदन द्वारा अनुमोदन करना पड़ेगा. यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि हरियाणा विधानसभा द्वारा पारित उक्त विधेयक में हालाकि भारतीय दंड संहिता (IPC) के दो प्रावधान ऐसे संशोधित किये गए जो संसद द्वारा संशोधित कानून में नहीं है. एक बार  जब कोई सत्तारूढ़ सरकार विधानसभा में कोई विधेयक पेश करती है एवं सदन उसे  पारित कर देता  हैतो उस विधेयक को वापिस लेने का अधिकार भी विधानसभा के पास ही होना चाहिए न कि राज्य सरकार के पास क्योंकि कोई भी विधेयक सदन से पारित होने के बाद एक प्रकार से सदन की ही संपत्ति बन जाता हैराज्य सरकार की नहीं. एडवोकेट हेमंत ने एक  पत्र याचिका हरियाणा विधानसभा के स्पीकर महोदय को भेजकर उक्त तथ्यों पर  त्वरित संज्ञान लेकर उचित कार्यवाही करने की गुहार लगायी है. हेमन्त ने कहा कि सत्तारूढ़ मनोहर लाल सरकार को ने केवल सदन को विधानसभा द्वारा पारित विधेयक का परित्याग करने बाबत सूचित करना चाहिए बल्कि एक नया दंड संशोधन विधि विधेयक भी लाना चाहिए जिसके द्वारा IPC की उक्त वर्णित दो धाराओ 354 एवं 354D(2) में पुन: वैसा ही संशोधन किया जाए जैसा कि मार्च माह में विधानसभा द्वारा पारित विधेयक में किया गया. उक्त दो प्रावधानों के पुन: सख्त होने से यह प्रदेश की महिलाओं की गरिमा एवं सुरक्षा पर दिन प्रतिदिन बढ़ रहे अपराधो पर अंकुश लगाने में निश्चय ही कारगर सिद्ध होंगे.

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