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हरियाणा विधानसभा द्वारा संशोधित धारा 354 आई.पी.सी. नहीं हो पाएगी लागू:हेमन्त कुमार

November 08, 2018 04:43 PM

चंडीगढ़  --  तीन माह पहले  11 अगस्त को  भारत के महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित  दंड विधि (संशोधन) विधेयक, 2018 को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी जिससे पश्चात यह   ओपचारिक विधिवत कानून बन गया हालाकि यह पूरे देश में इस वर्ष 21 अप्रैल से ही लागू हो गया था जब मोदी सरकार ने इसे अध्यादेश के रूप में राष्ट्रपति से जारी करवाया था . इसी के दृष्टिगत हरियाणा की सत्तारूढ़ खट्टर सरकार ने  इस वर्ष  मार्च माह में हरियाणा विधानसभा के बजट सत्र के अंतिम दिन पारित किये गए दंड-विधि (हरियाणा संशोधन) विधेयक2018 का परित्याग करने और संसद के उक्त कानून को ही अपनाने का फैसला किया क्योंकि हरियाणा के विधेयक में मोजूद बलात्कार की सज़ा से  सम्बंधित कड़े किये गए प्रावधानों को संसद द्वारा पारित  कानून में न केवल सम्मिलित किया गया  है बल्कि इनको और भी सख्त किया गया है. इस बारे में  पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के  एडवोकेट  हेमन्त कुमार  ने बताया हरियाणा विधानसभा द्वारा पारित विधेयक में हालाकि भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) के दो प्रावधान ऐसे संशोधित किये गए जो संसद द्वारा संशोधित कानून में नहीं है. एक तो आई.पी.सी  की धारा 354 (लज्जा-भंग करना ) में वर्तमान वर्णित कारावास  सजा  को बढाकर दोनों में से किसी भी भांति का कम से कम दो वर्ष और अधिकतम सात वर्ष करने का फैसला लिया गया. अभी वर्तमान में  इसमें कम से कम एक वर्ष और अधिकतम पांच वर्ष का कारावास का प्रावधान है. इसके अतिरिक्त धारा 354 D (2)  ( महिला का पीछा करना) में  भी दूसरी बार  एवं उसके अधिक बार दोषी पाए जाने पर दोनों में से किसी भांति के कारावास की अवधि अधिकतम सात वर्ष कर दी गयी है. अभी यह अधिकतम अवधि पांच वर्ष है. एडवोकेट  हेमन्त ने बताया कि राज्य विधानसभा में  पास होने के बाद  दंड विधि (हरियाणा संशोधन ) विधेयक2018  हरियाणा के राज्यपाल के पास गया जहाँ से महामहिम द्वारा उसे  केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को भेजा जाना चाहिए था  ताकि इस  पर  भारत के राष्ट्रपति महोदय की स्वीकृति ली जा सके. वर्तमान परिस्थितियों में  हरियाणा विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को अगर राष्ट्रपति महोदय की स्वीकृति मिल भी जातीफिर भी उसका आंशिक अनुपालन नहीं हो सकता थाअत: हरियाणा का  अपने विधेयक का पूरी तरह परित्याग करना का फैसला उचित प्रतीत होता है हालाकि क्या यह पूर्णतया न्यायोचित है न नहीयह देखने वाली बात होगी. बहरहालइसी बीच एडवोकेट हेमन्त ने हरियाणा के राजभवन में गत माह एक आर.टी.आई. याचिका दायर कर हरियाणा विधानसभा द्वारा इस वर्ष मार्च माह में पारित  दंड-विधि (हरियाणा संशोधन) विधेयक2018 के मोजूदा स्टेटस के बारे में सूचना प्रदान करने  की मांग की  है. हेमंत ने राजभवन से यह भी जानकारी मांगी है कि क्या हरियाणा  सरकार राज्य विधानसभा द्वारा विधिवत रूप से पारित किसी विधेयक को, ऐसे में जब  राज्यपाल या राष्ट्रपति महोदय ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किये हो, ऐसी परिस्थिति में उसे अपने  तौर पर ही, चाहे किसी भी कारण के फलस्वरूप, वापिस लेने का निर्णय ले सकती है. उन्होंने कहा कि एक बार  जब कोई सत्तारूढ़ सरकार विधानसभा में कोई विधेयक पेश करती है एवं सदन उसे  पारित कर देता  हैतो उस विधेयक को वापिस लेने का अधिकार भी विधानसभा के पास होता है   न कि राज्य सरकार के पास क्योंकि कोई भी विधेयक सदन से पारित होने के बाद एक प्रकार से सदन की ही संपत्ति बन जाता है, राज्य सरकार की नहीं. बहरहालएडवोकेट हेमंत ने मांग की है की खट्टर  सरकार को  नया दंड संशोधन विधि विधेयक लाना चाहिए जिसके द्वारा IPC की उक्त वर्णित दो धाराओ 354 एवं 354D(2) में पुन: वैसा ही संशोधन किया जाए जैसा कि मार्च माह में विधानसभा द्वारा पारित विधेयक में किया गया. उक्त दो प्रावधानों के पुन: सख्त होने से यह प्रदेश की महिलाओं की गरिमा एवं सुरक्षा पर दिन प्रतिदिन बढ़ रहे अपराधो पर अंकुश लगाने में निश्चय ही कारगर सिद्ध होंगे.

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