Wednesday, December 12, 2018
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Editorial

NBT EDIT -हिलती-डुलती सियासत

October 08, 2018 05:49 AM

COURTESY NBT OCT 8

हिलती-डुलती सियासत


चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखें घोषित कर दीं, लेकिन एक हद तक मिजोरम और राजस्थान को छोड़ दें तो कहीं भी यह साफ नहीं है कि लड़ाई का स्वरूप क्या होगा। मिजोरम में मुख्य लड़ाई कांग्रेस और मिजो नेशनल फ्रंट की अगुआई वाले मिजोरम डेमोक्रैटिक अलायंस के बीच है जबकि राजस्थान में भी सीधी लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच होनी है। बाकी राज्यों के बारे में इतने निश्चय के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। तेलंगाना को अपने मुख्यमंत्री की सियासी चाल के तहत इन चारों राज्यों के साथ चुनावी लड़ाई में शामिल होना पड़ा, लेकिन हालात वहां भी रोज बदल रहे हैं। मुख्य लड़ाई भले टीआरएस और कांग्रेस में हो, पर तेलुगूदेशम का भी कुछ क्षेत्रों और जातियों में अच्छा प्रभाव है। इस चुनाव में अगर कांग्रेस और तेलुगूदेशम के बीच गठबंधन बनता है तो न केवल चुनाव नतीजों पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा, बल्कि यह पहला मौका होगा जब एक-दूसरे की प्रबल विरोधी मानी जाने वाली ये पार्टियां साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगी। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बीजेपी पिछले 15 वर्षों से सरकार में है और इन राज्यों के चुनावों को सबसे ज्यादा दिलचस्पी से देखा जाएगा। छत्तीसगढ़ में यह पहला मौका है जब बीजेपी और कांग्रेस के अलावा कोई तीसरा पक्ष भी मैदान में है। अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस ने बीएसपी से गठबंधन किया है। यह पार्टी पहली बार ही विधानसभा चुनाव का सामना कर रही है, इसलिए इसके वास्तविक प्रभाव के बारे में अभी से कुछ कहना मुश्किल है। बीएसपी की ताकत यहां सीमित ही है, लेकिन उसकी बातचीत पहले कांग्रेस से चल रही थी। इन दोनों पार्टियों का साथ आना कांग्रेस के लिए झटका तो है, पर यह गठबंधन चुनाव नतीजों को किस हद तक प्रभावित करेगा, इस बारे में फिलहाल अटकलें ही लगाई जा सकती हैं। जहां तक मध्य प्रदेश की बात है तो वहां कई तरह के कारक अनिश्चितता को बढ़ा रहे हैं। पिछले कुछ समय से प्रदेश में सवर्ण असंतोष फूट पड़ा है, जिसका शिकार कांग्रेस और बीजेपी, दोनों पार्टियां हुई हैं। प्रदेश बीजेपी में पिछड़ा नेतृत्व ऊपर से नीचे तक दिखता है, जबकि कांग्रेस के सभी प्रभावशाली नेता सवर्ण हैं। इस असंतोष को अगर कोई चुनावी शक्ल मिलती है तो कांग्रेस के लिए यह ज्यादा बड़ी चिंता का विषय होगा। बीएसपी ने मध्य प्रदेश में अकेले लड़ने की बात कही है, लेकिन समाजवादी पार्टी द्वारा छोड़ा गया बीएसपी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से हाथ मिलाने का सुर्रा इससे ज्यादा बड़ी बात है। इन पार्टियों की पहल पर चुनाव में सवर्ण गोलबंदी के बरक्स अगर पिछड़ा-दलित एकता के पॉकेट बनते दिखे तो कांग्रेस को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। संभव है, इस डर से गठबंधन का बंद दरवाजा उसे दोबारा खोलना पड़े।
विधानसभा चुनावों की मोर्चाबंदी

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