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बढ़ते व्यर्थ व कूढ़े के ढेर पर बैठा विश्व

October 06, 2018 05:07 PM

विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार पूरा विश्व कूड़े के ढेर के रूप में परिवर्तित हो गया है तथा निकट भविष्य में यदि इसे रोका ना गया तो पूरे पृथ्वी ग्रह का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा कूड़ेदान बना होगा । सचमुच यह चिंता का विषय है । लगभग 700 करोड़ की आबादी वाला यह संसार किस तरफ बढ़ रहा है इसका अंदाजा इस रिपोर्ट के शीर्षक से ही लगाया जा सकता है “ WHAT A WASTE 2.0” 1 अमीर राष्टृ गरीब देशों को इस के लिए दोषी मान रहे है क्योंकि उनका मानना है कि वे अपने कूड़े प्रबंधन के आधुनिक साधनों तथा तकनीकों द्वारा इस समस्या से निदान पा रहे हैं जबकि गरीब देश कूड़ा प्रबंधन में न तो पैसा लगा रहे है न ही इसे समस्या मान रहे हैं, वहीं अमीर देश ये भूल रहे है कि कूड़े की शुरूआत उन्हीें से हो रही है । केवल अमेरिका, कनाडा तथा यूरोपियन देश, विश्व का 34 प्रतिषत कूड़ा पैदा करते है जबकि विश्व की कुल जनसंख्या का 16 प्रतिशत ही वहां निवास करता है । उत्तरी अमेरिका में प्रति व्यक्ति कूड़ा पैदा करने की दर 4.87 पांउड है यानि 2.20 किलो जबकि यही दर अफ्रीका जैसे गरीब देष में 1.01 पाउंड यानि 458 ग्राम है । कहने का अभिप्रायः यह है कि वैश्विक स्तर पर विकासशील देश तथा विकसित राष्टृ जैसे जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर एक दूसरे को दोषारोपण करते रहते है वैसे ही इस मुद्दे पर भी ध्ुार विरोधी बने है । अब अपने भारत को ही ले लीजिए । स्वच्छ भारत मिशन में कूड़े के उत्पादन, उसकी एकत्रीकरण, रिसाईकलिंग तथा ठिकाने लगाने में लोगों को इस प्रक्रिया में सहयोगी तथा सहभागी बनने के लिए न केवल प्रेरित किया जा रहा है अपितु शहर-शहर गांव गांव में इसके सफल अभियान पर पैसा भी खर्च किया जा रहा है । शौचालय बनाने तक सीमित न कर, हर घर देवालय बने क्योंकि स्वच्छता में ही ईश्वर का वास होता है । हम भारतीयों की यह पहली प्राथमिकता होनी चाहिए । पाश्चात्य देशों की नकल take, make and dispose” की बजाय अपने देश की संस्कृति के मानक ‘‘ सादा जीवन उच्च विचार ‘‘ तथा अपरिग्रह जैसे सिद्धान्तों का पालन कर ही इस समस्या से निजात पाया जा सकता है । बढ़ता उपभोक्तावाद ही इस पूरी समस्या की जड़ है। अंधाधुंध प्राकृतिक साधनों का विदोहन तथा शोषण की हद तक फैले उत्पादन साधन इस पूरे विश्व में फैली कूड़े की दलदल के लिए जिम्मेदार है । उपयोग करो व फैंकों यूज एण्ड थ्रो का पाश्चात्य व आधुनिक संस्कार पूरे विश्व में बढ़ती विषमता के लिए तो जिम्मेवाद है ही, विश्व को कूढ़ेदान बनाने में भी जीवन जीने का तरीका यही काम कर रहा है । विश्व को यदि रहने के लिए बेहतर स्थान बनाना है तो जरूरी है कि कूड़े के उत्पादन, उसकी रिसाइकलिंग तथा ठिकाने लगाने के तरीकों पर नये सिरे से सोचना होगा तथा इस दिशा में सार्थक तथा रचनात्मक कदम उठाने होंगे । आवश्यकता है कि इस समस्या के प्रति अपनी जागरूकता बनाये तथा निरंतर उत्पादनशील बन, साधनों का अपव्यय तथा व्यर्थ प्रयोग पर लगाम लगा, स्वः उपभोग पर केन्द्रित होने की बजाय ‘‘ शेयरिंग और केयरिंग‘‘ अद्यारित जीवन प्रणाली द्वारा हमारी प्यारी द्यरा पृथ्वी को रहने योग्य, स्वच्छ व सुंदर बनाये ।
                                     डा0क 0कली

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