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महिलाओं की सवैधानिक स्वतंत्रता पर उठा बवाल

October 01, 2018 07:30 PM

औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया’’ ये पंक्तियां ह्रदय में गूंज उठी जब हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले जिसमें व्याभिचार या जार कर्म को आपराधिक मामला नहीं माना जाएगा । पवित्रता, नैतिकता तथा रिश्तों में पारदर्शिता, समाजिक वातावरण की उपज होती है तथा इसे समाजिक ताना बाना प्रभावित करता है । स्त्री द्वारा किसी परपुरूष के साथ लैंगिक सम्बन्ध बनाने पर, उसका पति उस दूसरे पुरूष पर इस फैसले से पहले, आपराधिक मामला दर्ज करवा सकता था, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि स्त्री पुरूष की सम्पत्ति है तथा उसकी स्त्री पर हाथ डालना उसकी सम्पत्ति पर डकैती की तरह ही क्रिमिनल कार्य माना जाता रहा है । लेकिन वर्तमान फैसले में यही आधार लिया गया है कि स्त्री का कानून अपना प्रथक अस्तित्व है तथा वह विवाहोपरान्त पुरूष की सम्पत्ति नहीं बन जाती, यदि वो चाहे तो अपनी इच्छा से दूसरे पुरूष के साथ सैक्सुयल संबंध बनाने के लिए स्वतंत्र है। उसका पति दूसरे पुरूष को अपराधी नहीं ठहरा सकता । हालांकि तलाक के लिए इसे अब भी आधार बनाया जा सकता है । यह महत्वपूर्ण निर्णय है, जो आज के समय की सच्चाई को रेखांकित कर रहा है । पुरूष यदि शादी के बाद संबंध बनाने में स्वतंत्र है, उसकी स्त्री उसके विरूद्ध आपराधिक मामला नहीं बना सकती, तो अब स्त्री भी इस संदर्भ में स्वतंत्र कर दी गयी है । हालांकि इस निर्णय में पुरुष को आपराधिक मामले से मुक्त किया गया है क्योेंकि पति पर पुरुष पर यदि वह उसकी स्त्री से सैक्स संबंध बनाता है तो सिविल केस तो होगा, पर अब आपराधिक मामला दर्ज नहीं हो सकेगा । समाज तथा धर्म के नैतिक ठेकेदार इस निर्णय पर हो-हल्ला मचा रहे हैं तथा ऐसा माना जा रहा है कि पहले से ही समाज में रिश्तों में स्थायित्व घट रहा है, शादी जैसे पवित्र बंधन, स्त्री-पुरुष संबंधों में बराबरी का नया मोड़ अब उतने पवित्र नहीं रह गये है, घर परिवार टूट रहे है तथा स्वच्छंदता पारविारिक सुख शांति को लील रही है । लैंगिक संबंधों के चलते इस निर्णय में यह भी कहा गया है कि पुरुष को भी बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि विवाह से इतर संबंध खराब विवाह की उपज होते है, कि पुरुष बाहर ताक-झांक इसलिए करता है क्योंकि उसे घर में वह सुख नहीं मिला रहा है, अगर स्त्री के लिए यह आपराधिक मामला नहीं तो पुरुष के लिए क्यों । वर्तमान दौर में नारी सवैधानिक स्वतंत्रता के साथ साथ अर्थिक रूप् से स्वतंत्र बन रही है तथा समाजिक बंद्यन भी ढीले हो रहे है । समाज में जो खुलापन आया है उसके चलते इस निर्णय का स्वागत करना चाहिए । स्त्री पुरुष की सम्पत्ति नहीं है तथा न ही पुरुष उसका स्वामी । जीवन की गाड़ी में पति पत्नी दोनों बराबर के सांझेदार या भागीदार है । महाभारत में द्रौपदी के चीरहरण के प्रसंग में, उस सभा में उपस्थित सभी बड़े तथा गुरुजनों समझे सुलझे लोगों से पूछती है कि क्या वो अपने पति की सम्पत्ति है, जिसे युधिष्ठिर ने उसे दांव पर लगाया है । उस समय की सभी निरुतर रहती है, मौन द्यारण कर द्रौपदी के प्रश्नों का उत्तर न देकर गंद्यारी उसे स्त्री होने का वास्ता देकर चुप कर देती है । गौतर ऋषि अपनी पत्नी को इन्द्र द्वारा छले जाने पर पत्थर की शिला बना देते हैं क्योंकि वह इन्द्र जो गौतम ऋषि का रूप् बनाकर आता है और वह पर पुरुष को पहचान नह।ीं पाती । पुरुष प्रधान समाज में नियम, कायदे-कानून स पुरुष के पक्ष में बनाये गये है । यही कारण है कि स्त्री शोषित, वंचित, बेचारी तथा अबला बन दी गई है । पर अब नारी जाग उठी है,पुरुष भी उसकी स्वतंत्रता का हिमायती है तथा उसे बराबर की भागेदारी देने का तैयार है। सही संदर्भ में तथा खुले मान से इस निर्णय का स्वागत करना चाहिए न कि इसे ऐसा देखा व माना जाए जैसे कि दिखाया जा रहा है कि व्यभिचार या जार कर्म अब जायज हो गया है । एडलटरी अब अपराध नहीं रहा रिश्तों में रही सही पवित्रता भी अब जाती रहेगी । ऐसा मंतव्य इस फैसले का नहीं माना जाना चाहिये । बदलते परिवेश में बदलती धारणाओं के चलते इस आधुनिक दौर में नारी व पुरुष दोनों को एक दूसरे की स्वतंत्रताका मान करना चाहिए तथा खुलेपन को, आजाद ख्यालों को जीवन में आगे बढने तथा विकास के लिए उपयोग करना चाहिए ।
                              डा0 क कली

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