Tuesday, December 11, 2018
Follow us on
National

सर्जिकल स्टाइक बनाम यूजीसी

September 26, 2018 07:40 PM

कहते हैं कि युद्ध और प्यार में हर चीज, हर क्रिया जायज है । पर अब यह कथन लोकतंत्र में चुनावों पर भी लागू हो रहा है । चुनाव आते ही, मतदाताओं को लुभाने, उनका ध्यान आर्किषत करने के लिए सरकार व विपक्ष के राजनैतिक दल तरह-तरह के नगाड़े बजाने शुरू कर देते हैं । देश व समाज संस्थाओं से बनता है, पर संस्थाओं की स्वतंत्रता व उनकी स्वायतता पर निरंतर प्रहार जारी है, इसका ताजा उदाहरण यूजीसी द्वारा सभी विश्वविद्यालयों को यह आदेश जारी करना है जिसमें सभी महाविद्यालयों में 29 सितम्बर, 2016 को सर्जिकल स्टाइक उत्तर पश्चिमी सीमा पर भारत द्वारा किया गया था । उस सफल अभियान को 29 सितम्बर के दिन के रूप में मनाया जाए । हद हो गई है, विश्वविद्यालयों में जो कि ज्ञान अर्जन, स्वतंत्र व नये विचारों के आदान-प्रदाल, अनुसंद्यान का केंद्र होते है, सरकार के हितों व सत्तारूढ़ पार्टी के हितों के संवद्यर्न के लिए खुलम-खुल्ला प्रयोग किया जा रहा हैं । युवा पीढ़ी को राष्ट प्रेम व राष्टीयता की भावना का संचार करने के लिये, उन्हें इस प्रकार की जानकारियां देना इनसे अवगत कराने के लिए यू.जी.सी ने विश्वविद्यालयों को 29 सितम्बर के दिन सर्जिकल स्टाइक की सफलता पर सेमिनार संगोष्ठियां, निबन्ध लेखन तथा स्लोगन लेखन इत्यादि प्रतियोगिताएं रखने का आदेश अपने अन्तर्गत आने वाले महाविद्यालयों को जारी किया है । वर्तमान सरकार अपनी सामरिक व स्टैटाजिक सफलता, जोकि एक आर्मी एक्शन था. उसकी वाह-वाही लूटना चाहती है तथा विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले युवा, क्योंकि वोटर्स भी हैं उन्हें प्रभावित करना चाह रही है । मतलब 2014 चुनावों में पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को कमजोर बता, नरेन्द्र मोदी जी ने अपने पक्ष में हवा बनाई तथा अपनी 56 इंची छाती का हवाला दे पाकिस्तान के विरू़ध कड़ा व सशक्त रूख दिखाने का वायदा कर चुनाव में जीत हासिल की । उसी का प्रमाण जनता के सामने वे सर्जिकल स्टाईक के रूप में दे रहे हैं । यहां पर यह बताना जरूरी है कि पहले से भी 1948 में, 1965 में, 1971 में बड़े-बड़े अभियान पाकिस्तान के विरू़़द्ध इसी सीमा पर लड़े गए व जीते भी गये, उन्हें इस तरह सार्वजनिक रूप से भी जोकि एक आर्मी एक्शन है, युद्व है, पड़ोसी के साथ, स्मति समारोह के रुप में नहीं मनाया गया । विश्वविद्यालय व महाविद्यालय राजनीति के अखाड़े बन चुके हैं यही कारण है कि विश्व के टाप 100 युनिवर्सिटज में भारत की कोई भी युनिवर्सिटी शामिल नहीं है । एक तरफ भाारत को विश्व गुरू बनाने के सपन संजोये जा रहे है तो दूसरी तरफ विश्वविद्यालयों की बची-खुची गरिमा, जो कि स्वतंत्रता व स्वायत्ता से प्राप्त होती है, उसे रोंदा जा रहा है । स्वतंत्र चिंतन, मनन व लेखन के लिए विश्वविद्यालय ही अगर उन्मुक्त वातावरण प्रदान नहीं करते, युवा पीढ़ी को जिस दिशा में हांकना चाहो, उन्हें उधर ही हांक दो। तो उस राष्ट का भविष्य कभी उज्जवल नहीं हो सकता । अंत में जुनून का दौर है. किस किस को जायें समझाने, इधर भी अक्ल के दुश्मन है, उधर भी दीवाने ।

                         डा0 क कली

Have something to say? Post your comment
More National News
RBI के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के इस्तीफे की खबर गलत मोदी के साथ काम नही कर सके उर्जित पटेल इसलिए दिया इस्तीफा-राहुल MP Elections: मतगणना कल सुबह 8 बजे होगी शुरू, 15000 कर्मचारी-अफसर तैनात पश्चिम बंगाल: हावड़ा जिले के रामराजातला में यात्री ट्रेन पटरी से उतरी 13 दिसंबर को BJP संसदीय दल की बैठक, 5 राज्यों के नतीजों की होगी समीक्षा अगस्ता वेस्टलैंड: क्रिश्चियन मिशेल को 5 दिन की CBI ने रिमांड पर भेजा गया आज 5 दिवसीय म्यांमार दौरे पर जाएंगे राष्ट्रपति कोविंद निजामुद्दीन दरगाह में महिलाओं के प्रवेश की याचिका पर दिल्ली HC में सुनवाई आज काउंटिग हॉल में वाईफाई का इस्तेमाल नहीं करने के निर्देश: MP CEO मतगणना की लाइव वेबकास्टिंग नहीं होगी: MP CEO