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जीवन में बढ़ता उतावलापन

September 24, 2018 04:28 PM

उतावलेपन की इस युग में हर क्षेत्र में मानव इससे जूझ रहा है। आज हर व्यक्ति इतना उतावला है कि जो स्पीड कभी गुण हुआ करती थी, अवगुण का रूप धारण करती जा रही है। हर कोई भागा जा रहा है, कहां भागा जा रहा है? किसलिये, इतना विचारने सोचने का समय नहीं है। इस उतावलेपन का परिणाम है कि जीवन में श्रेष्ठता, सत्य की खोज, गंभीरता सब गायब होती जा रही है। पत्रकारिता या खेल जगत में यह उतावलापन कुछ हद तक गुण हो सकता है, पर बिना तथ्य जाने, प्रमाण के अभाव में भी वह सब कुछ कह देना जो सुविधाजनक व स्वार्थ की पूर्ति करता हो, आज आम बात हो गई है। राजनेताओं की तो पूछो ही मत, सत्ता हथयाने व उस पर काबिल करने तथा बने रहने में इतने आतुर हैं कि नीति, मर्यादा व सिद्वांत, असूलों जैसे शब्द अब सुनाई ही नहीं देते। भाजपा अध्यक्ष ये कहते हैं अगर वो 2019 का चुनाव जीत लेते हैं तो अगले 50 वर्षों तक उनका ही राज रहेगा अर्थात प्रजातन्त्र में जो पांच वर्षीय चुनावी कंुभ लगता है वह अर्धशती तक फैल जायेगा, उधर विपक्ष वाले ‘‘मोदी शाह हटाओ’’ के एकसूत्री कार्यक्रम बनाये बैठे हैं। कहते हैं कि रास्ता चाहे कितना भी खूबसूरत, सुगम व सुविधाजनक हो, हम केवल इसलिये ही उस पर नहीं चलते हैं, बल्कि वो रास्ता किस मंजिल तक ले जायेगा, यह महत्वपूर्ण है। मंजिल अगर सही है तो रास्ता चाहे कितना भी उबड़-खाबड़ हो, कठिनाई वाला दुर्गम पथ हो, चलते जाना चाहिये। पर आज इन सब पर विचार करने, विकल्प तलाशने, तर्कसंगत चुनाव करने का न तो धैर्य है, न ही क्षमता, न ही समय किसी के पास है। ‘‘सजह पके सो मीठा होय’’ तो व्यवहार से ही नदारद है। ‘क्षण’ के इस युग में instant coffee or instant noodles पर पली बड़ी युवा पीढ़ी instant sex में लिप्त दीर्घकालीन तथा जिम्मेवारी वाले स्थायी पारिवारिक रिश्तों से कन्नी काटती नजर आती है। जीवन में गूढ़ता, गंभीरता तथ श्रेष्ठता की चाह, सिरे से ही गायब होती जा रही है। न केवल निजी जीवन में, अपितु हर जगह सार्वजनिक जीवन में, चाहे वह सामाजिक आर्थिक हो या सांस्कतिक, इस उतावलेपन ने खोखलापन पैदा कर दिया है। आज हा युवा, शीघ्रातिशीघ्र मिलियेनर व बिलियनेयर बनना चाहता है। होड़ के इस युग में तनाव, मानसिक असंतुलन, अशांति व हिंसा की तरफ बढ़ रहा है। सतही जीवन जीने का आदी हो चुका मानव केवल स्थूल व भौतिक जीवन को ही सत्य मानकर धर्म के वास्तविक अर्थ व उसके आचरण से दूर होता जा रहा है। कहते सुना था कि ‘कलयुग नहीं कर युग है यह, इस हाथ ले, उस हाथ दे’ का मतलब इतना ही समझा जाता था कि सोच समझ कर कर्म करना चाहिये कि गलत कार्य का फल इस युग में उसी वक्त मिल जाता है। पर आज यह विचार समय के भी उतावलेपन को दिखाता है। ब्रेकिंग न्यज के जमाने में समाचार रिर्पोटंग में उतावलापन आवश्यक मजबूरी व गुण हो सकता है पर वह गुण जीवन को परिभाषित करने वाला नही बनना चाहिये जैसे शौच कर्म शौच कि अगर तलब लग जाये तो शौचालय जाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये पर क्या सारा दिन सारा समय तो शौचालय में नहीं बैठा जा सकता, कोई मूर्ख ही ऐसा कर व सोच सकता है, पर यही गांठ खोलने की आवश्यकता है, क्या हमने पूरे जीवन को ऐसे दबाव व उतावलेपन की तरफ नहीं धकेल दिया है। जीवन की लय-ताल उसके सुर से उखड़ गई है। पुनः इसमें सामंजस्य बैठाने की जरूरत है। जमाना जिस तीव्र गति से बदल रहा है, उस गति की शिकायत करना शायद बेमानी होगा, पर उसके बदलने की दिशा  में सार्थक कदम उठाये जा सकते हैं। हवा को तो बहना है, ऐसे ही जीवन को तो चलना है, लेकिन किस दिशा में चलना है? यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस उतावलेपन, जल्दी लिये हुए युग में चलने व भागने के साथ-साथ, कहां जा रहे हैं, कहां मंजिल है, यह विचारना बहुत ही जरूरी है। जैसे कुशल नाविक, हवा के रूख व गति के साथ तालमेल बिठा अपने नाव को मंजिल तक ले जाता है, ऐसे ही अपने उतावलेपन व जल्दी की शक्ति का रचनात्मक प्रयोग कर सार्थक व संतुष्ट जीवन की राह पर चलना होगा।
                                 डा क कली

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