Saturday, October 20, 2018
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Editorial

NBT EDIT-आरएसएस का विजन

September 18, 2018 06:01 AM

COURTESY NBT SEPT 18 EDITOIRAL

आरएसएस का विजन


खुद को ‘सांस्कृतिक संगठन’ बताने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत के भविष्य को लेकर अपना नजरिया बताने की एक बड़ी पहल की है। राजधानी दिल्ली में सोमवार से शुरू हुए तीन दिवसीय कार्यक्रम में संघ नेतृत्व देश-विदेश से आमंत्रित अतिथियों के सामने यह स्पष्ट कर रहा है कि भारत के भविष्य से जुड़े विविध पहलुओं पर उसकी सोच क्या है। इस आयोजन के समय और इसके तरीकों को लेकर कुछ सवाल भी उठाए जा रहे हैं, लेकिन ऐसे सवालों से इस बात की अहमियत कम नहीं होती कि देश के सबसे पुराने और व्यापक संगठनों में से एक ने अपनी तरफ से पहलकदमी लेकर विभिन्न सवालों पर स्याह-सफेद में अपनी राय रखने और उस पर सवाल-जवाब की प्रक्रिया में जाने की कोशिश की है। अगर आपको विभिन्न विवादास्पद मसलों पर उसकी राय पता हो तो न सिर्फ आप उससे सहमत या असहमत हो सकते हैं, बल्कि कभी भी उसके विचलन को रेखांकित कर सकते हैं। जो संगठन आरएसएस को पानी पी-पीकर कोसते हैं, उन्होंने तो कभी यह बताने की जहमत मोल नहीं ली कि देश के विकास को लेकर, संसाधनों के बंटवारे को लेकर, अवसरों की समानता को लेकर उनकी अपनी क्या दृष्टि है। बेहतर होगा कि संघ की इस पहल से प्रेरणा लेकर अन्य दल और संगठन भी अपनी बुनियादी दृष्टि के बारे में आम देशवासियों की समझ साफ करें ताकि उनके समर्थकों और विरोधियों को ऐसी कसौटियां उपलब्ध हों, जिन पर उनके कामकाज को परखा जा सके। मगर संघ की इस कवायद का भी कोई मतलब तभी बनेगा जब वह देश को तीन दिनों के इस कार्यक्रम में आरक्षण से लेकर काले धन तक हर मामले में अपने ठोस विचारों से परिचित करा सके। दरअसल, स्पष्टता और पारदर्शिता से संघ को भी अब तक एक किस्म की एलर्जी ही रही है। मसलन, संघ चाहता है और बार-बार कहता भी है कि वह कोई राजनीतिक संगठन नहीं है और उसके हर काम को बीजेपी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन तकरीबन हर चुनाव से पहले ऐसी खबरें आती हैं कि हजारों संघ कार्यकर्ता बीजेपी के पक्ष में कूद पड़े हैं। याद नहीं पड़ता कि संघ ने कभी इन खबरों का खंडन करने का प्रयास किया हो। मौजूदा कार्यक्रम में आमंत्रित किए जाने वालों के बारे में भी अलग-अलग बातें मीडिया में आती रहीं, जिनकी न तो पुष्टि की गई और न खंडन। यहां तक कि आखिरी पलों में सम्मेलन में शामिल होने वाले 500 लोगों की सूची चर्चा में रही, लेकिन वह सूची सार्वजनिक नहीं की गई। इससे यह राय मजबूत होती है कि संघ को अपने चारों ओर एक तरह की धुंध देखना अच्छा लगता है। किसी भी विचार प्रक्रिया का सर्वोत्कृष्ट तत्व आत्मालोचना हुआ करता है। देश यह जानना चाहेगा कि पिछले तीन दशकों में संघ परिवार के करीब आई शिव सेना से लेकर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी तक विभिन्न धाराएं उसकी किस कमी की वजह से दूर छिटक गईं।
औरों की भी भविष्य दृष्टि पता चले

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