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हिन्दी दिवस पर - वैश्वीकरण और मौजूदा हिन्दी की स्थिति

September 14, 2018 04:56 PM

टैक्नोलोजी तथा भूमंडलीयकरण के चलते हिन्दी की स्थिति सुधरी है, ऐसा माना जा रहा है। क्योंकि वाटसएैप, टिवटर, इन्सटाग्राम पर बढ़ते हिन्दी के प्रयोग से लगता है कि हिन्दी के अच्छे दिन आ गये हैं, जो काम नेता न कर सकते, वो कार्य कम्प्यूटर तथा मोबाइल टैक्नोलोजी द्वारा सम्पन्न किया जा रहा है। लेकिन हिन्दी प्रेमियों को इस मुगालते में न रहना चाहिये कि हिन्दी शासन व प्रशासन की भाषा बनेगी तथा सब काम हिन्दी में होने लगेगा। आज भी राजनेताओं की भाषा तो हिन्दी है, पर हिन्दी का व्यवहार व्यापक पैमाने पर प्रयोग बढ़ने के स्थान पर घटा है। भारतीय राजनीति व मनोरंजन के क्षेत्र में हिन्दी का सशक्त ज्ञान, बोलना व लिखना अनिवार्य शर्त है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने राजनीतिक कैरियर की सफलता का श्रेय अपने आपको हिन्दी में अभिव्यक्त करने की समर्थ शक्ति को देते थे। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का सफलता का श्रेय भी उनकी हिन्दी में अभिव्यक्ति की दक्षता को जाता है। अंग्रेजी बोलने वाला नेता, कभी भी इस देश में अपार जनसमूह का लोकप्रिय नेता नहीं बन सकता तथा न ही वोट राजनीति कर सकता। इसी प्रकार, मनोरंजन के क्षेत्र में भी अभिनेता व अभिनेत्रियों को हिन्दी में अपने आपको अभिव्यक्त करना अनिवार्य है, क्योंकि हिन्दी बैल्ट में फैले लोगों को आकर्षित करना तथा बनाये रखने के लिये जरूरी शर्त है। पर प्रश्न हिन्दी भाषा को समृद्ध करने तथा उसका हित संवर्धन करने का है। जिस देश में नेता संसद के पटल पर गर्व कर कहते हैं कि पिछले वर्ष तीन करोड़ के लगभग युवा भारतीयों ने विदेशों में उच्च शिक्षा के लिये विशेषकर अमेरिका व यूरोपियन देशों में वहां के विश्वविद्यालयों में प्रवेश लिया है, यह हमारे देश की उच्च शिक्षा की दयनीय हालत पर बहुत बड़ा कटाक्ष तो है ही, लेकिन हिन्दी भाषा व अन्य देशी भाषाओं के भविष्य पर भी सवालीय निशान लगाता है। बाहर के देशों में क्या वो हिन्दी सीखने गये हैं? देश का भविष्य युवा होते हैं, हिन्दी का भविष्य युवकों के कामकाज, व्यापार, धन्धा प्रबन्धन में प्रयोग की जा रही भाषा के साथ जुड़ा है। सरकारी क्षेत्रों में तो अंग्रेजी का प्रयोग विरासत में मिला है तथा प्रशासन में निकट भविष्य में तो अंग्रेजी से निजात पाना मुश्किल ही लगता है, बाबू लोग इस अंग्रेजियत को आगे ही ले जाने वाले हैं, पीछे नहीं। यहां प्रश्न निजी क्षेत्र में हिन्दी के विकास, उसके प्रयोग से जुड़ा है। थोपी हुई भाषा, चाहे वो मातृ भाषा हो या विदेशी भाषा, कभी भी पूर्ण विकास को नहीं पा सकती। अपनी भावनाओं, विचारों, सपनों, इच्छाओं को अपनी मातृ भाषा में जितना सशक्त अभिव्यक्त कर सकते हैं। अन्य भाषाओं में नहीं, चाहे वे राजभाषा ही क्यांे न हो? यहीं पर हिन्दी भाषा व उसकी हमजौली देशी भाषाओं का विकास का पेच छिपा है। कानून व चिकित्सा, फाइनैंस जैसे क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग अपने आप बढ़ जायेगा। यदि हिन्दी जन-जन की भाषा बने तथा लोक व्यवहार में हिन्दी के प्रयोग को सम्मान की दृष्टि से देखा जाये। हिन्दी का ज्ञान व उसकी अभिव्यक्ति को ह्नेय न समझ कर अंग्रेजी की तरह ही संभ्रान्त माना जाये तथा अंग्रेजी को स्टेटस सिम्बल न मानकर गुलामी का प्रतीक माना जाये, तभी हिन्दी का भविष्य सुरक्षित एवं उज्ज्वल बन सकता है। वैश्वीकरण के चलते कई अन्य देशों में भी हिन्दी का प्रचार प्रसार बड़ा है तथा विश्व के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में हिन्दी को सीखने-सिखाने का कार्य चल रहा है। भारत का विस्तृत व विशाल बाजार वैश्विक कम्पनियों के लिये आकर्षण का केन्द्र बना हुआ हैं तथा उसमें पैठ बनाने के लिये बाजारी शक्तियां काम कर रही हैं। जो कार्य नेता व अभिनेता व हिन्दी के प्रबल समर्थक न कर सके वह कार्य बाजार की शक्तियों द्वारा सम्पन्न होगा। आवश्यकता केवल अवसर को पहचानने तथा उसके भरपूर दोहन पर निर्भर है। अपने-अपने स्तर पर हिन्दी भाषा पर काम करने, उसमें दक्षता प्राप्त करने तथा उसे समृद्ध बनाने का प्रयास करना चाहिये। अंत में दुष्यंत कुमार की ये पक्ंितयां ‘‘चाहे जो भी फसल उगा ले, जू जलधार बहाता चल, जिसका भी घर चमक उठे, तू प्रकाश लुटाता चल, रोक नहीं अपने अंतर का वेग किसी आशंका में, मन में उठे भाव जो उनका गीत बनाकर गाता चल।’’

                                डा.क.कली

 

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