Wednesday, September 19, 2018
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धारा 498 A आई.पी.सी. पर सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला

September 14, 2018 02:58 PM

अम्बाला शहर - आज माननीय सुप्रीम कोर्ट के तीन जज बेंच ने लगभग एक वर्ष पहले अपनी ही कोर्ट के  एक  दो जज बेंच द्वारा आई.पी.सी. की धारा 498A ( महिला पर  उसके पति एवं उसके रिश्तेदारों द्वारा दहेज़ या अन्य कारणों से अत्याचार/क्रूरता करना) के अंतर्गत दर्ज मामलो में सीधी गिरफ्तारी किये जाने में व्याप्त  दुरूपयोग को रोकने के लिए जो दिशा-निर्देश जारी किये गये थे, उन्हें संशोधित करने बाबत फैसला सुनाया है. स्थानीय निवासी पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के आज के निर्णय का पूरा  अध्ययन करने के बाद बताया कि  27 जुलाई2017 को राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश सरकार नामक  केस में सुप्रीम कोर्ट के दो जज  बेंच जिसमे तत्कालीन जस्टिस आदर्श कुमार गोएल एवं जस्टिस उदय उमेश ललित सम्मिलित थे  ने  आई.पी.सी. की धारा 498A के अंतर्गत केसों की प्रारम्भिक जांच एवं उनमें नामजद आरोपियों की गिरफ्त्कारी किये जाने से पहले कुछ दिशा-निर्देश दिए थे जिनकी अनुपालना करना अनिवार्य था. एडवोकेट हेमंत ने आगे बताया कि एक वर्ष पूर्व कोर्ट द्वारा बनाये गये इन   दिशा-निर्देशों में प्रमुखतया देश के हर जिले में जिला विधिक सेवाएँ अथॉरिटी (डी.एल.एस.ए ) द्वारा एक या अधिक फॅमिली वेलफेयर कमेटी  बनाने का निर्देश था जिसमे तीन सदस्य होने चाहिए थे जिनकी स्थापना एवं कार्यप्रणाली पर जिला सेशंस जज द्वारा वार्षिक स्तर पर समीक्षा की जानी थी. पुलिस एवं कोर्ट मजिस्ट्रेट द्वारा आई.पी.सी. की धारा498A के तहत दर्ज एवं प्राप्त शिकायत को उक्त कमेटी को रेफेर किया जाना अनिवार्य था जिस पर उक्त कमेटी एक माह के भीतर अपनी प्रारम्भिक जांच कर पुलिस या सम्बंधित कोर्ट  को अपनी रिपोर्ट भेजती  जिसे पुलिस के जांच अधिकारी (आई.ओ ) अथवा कोर्ट के मजिस्ट्रेट द्वारा उस केस में कंसीडर एवं अपने रिकॉर्ड पर लिया जाना था. आज सुप्रीम कोर्ट के तीन जज बेंच जिसमे भारत के मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा एवं जज ए.ए. खानविलकर एवं जज डॉ. डी.वाए. चंद्रचूड़ सम्मिलित थे, ने वर्ष 2015  में दायर एक रिट याचिका (सोशल एक्शन फोरम बनाम भारत सरकार) पर अपना फैसला सुनाते हुए यह निर्देश दिया है कि ऐसी फॅमिली वेलफेयर कमेटी बनाये जाने के निर्देश को भारतीय दंड विधि में कोई कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं नहीं है एवं अत: ऐसे कमेटी को कोई भी शक्ति नहीं दी जा सकती. इसका सीधा साधा अर्थ यह है कि अब देश के किसी भी जिले में ऐसे फॅमिली वेलफेयर कमेटी नहीं बनायीं जायेगी एवं जहाँ जहाँ यह बनायीं भी गई है, उन्हें तत्काल रूप से खत्म कर दिया जाएगा. हालाकि सुप्रीम कोर्ट ने आज यह भी निर्देश दिया कि पुलिस विभाग के जांच अधिकारी (आई.ओ ) ऐसे केसों में आरोपियों की गिरफ्तारी करने के मामलो में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ऐतिहासिक  फैसलों – जोगिन्दर कुमार (1993), डी.के. बासु (1997), ललिता कुमारी (1997)  एवं अर्नेश कुमार (2014) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों एवं सिद्धांतो का सख्ताई  से पालन करेंगे. इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट ने हर राज्य के डी.जी.पी. (पुलिस महानिदेशको ) को भी आदेश दिया है कि वो अपने राज्य में आई.पी.सी. कि धारा 498A में दर्ज मामलो की जांच करने वाले पुलिस जांच अधिकारियों की इस कानून के  अंतर्गत गिरफ्तारी करने से सम्बंधित सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की सख्त अनुपालना करने हेतू उनकी कठोर ट्रेनिंग करवाने  की  व्यवस्था करें. एडवोकेट हेमंत ने बताया कि अगर आई.पी.सी. की धारा 498A  के तहत दोनों पार्टियों में कोई समझौता हो जाता है, तो अब से दोनों पार्टियों को अपने राज्य की हाई कोर्ट में सी.आर.पी.सी. की धारा 482 में जाना होगा एवं हाई कोर्ट ऐसे मामलो में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले –ज्ञान सिंह बनाम पंजाब सरकार (2012) के आधार पर उस केस का निपटारा कर सकती है. पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट के दो जज बेंच ने  हालाकि ऐसे केस में समझौता होने पर जिला जज एवं उसके द्वारा नामांकित किसी वरिस्थ न्यायिक अधिकारी को ऐसे केसों का समझौता होने पर केस का निपटारा करने की शक्ति प्रदान कर दी थी. 

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