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Editorial

NAV BHARAT TIMES EDIT-जेब जलाता फ्यूल

September 10, 2018 06:34 AM

COURTESY NAV BHARAT TIMES EDIT

जेब जलाता फ्यूल


देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें लगभग रोज ही नए रेकॉर्ड बना रही हैं। हैरत की बात यह है कि सरकार और सत्तारूढ़ दलों में इस सवाल पर गजब की निश्चिंतता दिख रही है। समय-समय पर केंद्र सरकार का कोई मंत्री आकर ज्ञानवर्धन कर जाता है कि ऐसा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की चढ़ी कीमतों की वजह से हो रहा है। जब-तब उसके श्रीमुख से डॉलर के मुकाबले रुपये का भाव गिरने का जिक्र भी सुनने को मिल जाता है। लेकिन इस बारे में सरकार की कोई जवाबदेही बनती है या नहीं, और वह इस बाबत कभी कुछ करने की सोचेगी भी या नहीं, इस बारे में कोई कुछ कहने को तैयार नहीं है। विपक्षी पार्टियां भी अभी तक इस मसले को प्रभावी ढंग से उठाने में नाकाम रही हैं। नतीजा यह है कि आज के लिए कांग्रेस की तरफ से भारत बंद का आह्वान वास्तविक विरोध कम और पाप मुक्ति का प्रयास ज्यादा लग रहा है। बहरहाल, देश के राजनीतिक हलके को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों का लोगों पर कोई असर नहीं हो रहा। लोकतंत्र में निरंतर तकलीफ बर्दाश्त करते लोगों का धैर्य कब जवाब दे जाएगा, कहा नहीं जा सकता। और यह मामला सिर्फ मिडल क्लास की भावनाओं का नहीं है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगी आग किन-किन सेक्टरों को झुलसा रही है, इसका अंदाजा सरकार को जरूर होगा। डीजल की महंगाई खेती-किसानी का भट्ठा तो बिठा ही रही है, यह ट्रकों का चलना मुश्किल बना रही है और रेलवे का बजट भी बिगाड़ रही है। ऐसे में सरकार सिर्फ यह कहकर हाथ नहीं झाड़ सकती कि फ्यूल की कीमतें अब सरकार नहीं, ऑयल मार्केटिंग कंपनियां तय करती हैं। सचाई यह है कि इन चीजों की जो कीमत हम चुका रहे हैं, उसका बहुत बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों की जेब में जा रहा है। पेट्रोल के बाजार भाव में आज करीब 85 फीसदी हिस्सा उस टैक्स का है, जो सरकारें हमसे वसूल रही हैं। डीजल पर प्रति लीटर 15.33 रुपये और पेट्रोल पर प्रति लीटर 19.48 रुपये उत्पाद कर तो अभी अकेले केंद्र सरकार ही ले रही है। यहां इस तथ्य की याद दिलाना भी जरूरी लग रहा है कि केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर 11.77 रुपये और डीजल पर 13.47 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच बढ़ाई थी, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लगातार गिर रही थीं। बाद में कीमतें चढ़ती गईं, लेकिन यह बढ़ा हुआ टैक्स सिर्फ एक बार जरा सा कम हुआ। अक्टूबर 2017 में, कर्नाटक विधानसभा चुनाव वाले माहौल में, मात्र 2 रुपये प्रति लीटर। आखिर कोई तो सीमा होगी, जिसके ऊपर फ्यूल की कीमतों का जाना सरकार में बेचैनी पैदा करेगा/ अगर हां, तो अभी क्यों नहीं। समय आ गया है कि मोदी सरकार सभी राज्य सरकारों से परामर्श करके टैक्सों की सीमा बांधे और पेट्रोल-डीजल सस्ता करने का उपाय करे।
टैक्स तो घटा सकते हैं

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