Thursday, January 24, 2019
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Chandigarh

महंगाई के मुद्दे पर कब तक चुप रहेंगे?

September 08, 2018 03:47 PM
बढ़ती कीमतें, बढ़ती महंगाई किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा आंतरिक खतरा होती हैं। देश में हर दिन पैट्रोल और डीजल की कीमतें आकाश की तरफ रूख किए बढ़ती जा रही हैं। सरकार इस मुद्दे पर आंख मूंद कर बैठी है कि ये तो कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतें बढऩे से, कीमतें बढ़ रही हैं या ओपीईसी संघ कच्चे तेल की पूर्ति पर प्रतिबंध लगाए बैठे हैं। एक तकनीकी सर्वेक्षण के अनुसार पैट्रोल व डीजल की कीमतों में लगभग 85 प्रतिशत अंश दोनों केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए विभिन्न करों के रूप में एकत्रित किया जाता है। बात ग्राहक, उपभोक्ता या सामान्य नागरिक की हो रही है। वह हर तरफ से चक्की के दो पाटों में पिसता नजर आ रहा है। व्यापार-व्यवसाय-रोजगार के अवसर निरंतर कम हो रहे हैं। एक तरफ आय के स्रोत सूख रहे हैं, तो दूसरी तरफ मांग पक्ष पर बढ़ती कीमतें अपना जबरदस्त दबाव डाल रही हैं। पैट्रोल व डीजल कीमतें, बाकी सारे उत्पादों की कीमतों को बढ़ा देते हैं, क्योंकि ट्रांसपोर्ट-व्यापार और वाणिज्य का मूलभूत तत्व है, व्यक्तियों तथा वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना, स्थान तुष्टिगुण उत्पन्न करना व्यवसाय की आत्मा तथा प्राण होते हैं। प्रजातांत्रिक सरकारें अगर इस मुद्दे पर चुप रहती हैं तो वह अपने लिए बहुत बड़ा खतरा मोल लेती हैं। लोगों के कल्याण का आधार लिए, जनकल्याण- सर्व का हित साधने के उद्देश्य से नाना प्रकार की योजनाएं तथा कार्यक्रम बनाती हैं, पर बढ़ती कीमतें, इन सबके ऊपर पानी फेर देती है। ‘‘न्यूनतम सरकार तथा अधिकतम सुशासन’’ के नारे से आयी यह सरकार कीमतों को लगाम लगाने के पूर्णतय: असफल रही है। देश की आर्थिकी बेहद नाजुक स्थिति से गुजर रही है, लेकिन सरकारें अपने अनुत्पादकीय खर्चों में कोई कटौती करने को तैयार नहीं है। सुरसा के मुंह की तरफ बढ़ते सरकारी- जरूरी व गैर-जरूरी सभी खर्चों को पूरा करने के लिए सरकारें कर लगाती हैं, कर कैसे कम हो? जब खर्च वाले पहलू में निरंतर वृद्धि की जा रही है। ‘‘डॉलर तूं तो सुझ रहा है, रुपया मैं रो रहा हूँ’’ वाले जोक्स पुराने जोक्स की ‘‘थैलों में रुपये भरकर ले जाते हैं, मुट्ठी में चीजें आती हैं’’ का स्थान ले रहे हैं। बढ़ती आत्महत्याएं, डिप्रैशन तथा कुंठा, ये सब बिगड़ती आर्थिक स्थिति को इंगित कर रहे हैं। सामाजिक ताना-बाना अस्त-व्यस्त हो रहा है। समय रहते चेतना जरूरी है, अन्यथा कब हिंसा, लूटपाट- अपराध ही युवा भारत के पास केवल मात्र हथियार न बन जाए। राजनेताओं तथा सरकार को शर्म आनी चाहिए कि इस मुद्दे पर वह पूरी तरह से विफल है तथा मौन कोई समस्याओं का हल नहीं है। अंत में, ‘‘महंगाई हुई सयानी, भ्रष्टाचार हुआ जवान, इसलिए जोर से, गर्व से कहो मेरा भारत महान।’’
 
डॉ. क. कली
 
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