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हरियाणा में मेयर सीधे निर्वाचित करने के पीछे चुनाव आयोग की अनुशंसा या खट्टर सरकार की मंशा ?

September 06, 2018 03:14 PM

चंडीगढ़ : - गत दिवस हरियाणा मंत्रिमंडल की संपन्न हुई बैठक में अन्य निर्णयों के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण फैसला यह लिया गया है कि भविष्य में हरियाणा के मौजूदा सभी नगर निगमों के मेयर का “डायरेक्ट इलेक्शन” अर्थात उनके निगम-क्षेत्र के वोटरों द्वारा ही  किया  जाएगा। प्रदेश सरकार ने हालाकि इस निर्णय के पीछे राज्य चुनाव आयोग की इस सम्बन्ध में की गयी अनुशंसा को कारण बताया गया है  एवं उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं झारखण्ड आदि राज्यों  का उदाहरण भी  दिया है. बहरहाल, इस आशय पर कानूनी पक्ष के बारे में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने बताया की भारतीय संविधान के अनुच्छेद  243 आर 2(बी ) के तहत राज्य सरकारों को पूर्ण अधिकार है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र के नीचे आने वाली हर प्रकार की मुनिसिपलिटी (शहरी नगर निकाय संस्था) के चेयरपर्सन के चुनाव हेतू चाहे कैसा भी प्रावधान बना सकती है।उन्होंने बताया कि  हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994  जो प्रदेश के सभी मौजूदा दस निगमों पर लागू होता है की धारा 36  नगर निगम के मेयर के चुनाव से सम्बंधित है जिसके अनुसार मेयर का चुनाव निगम के नए निर्वाचित पार्षदों के द्वारा एवं उनके भीतर से ही किया जाता है। एडवोकेट हेमंत ने कहा कि हरियाणा नगर निगम चुनाव नियमावली,1994  के नियम 71 के अनुसार ऐसे चुने गए मेयर का कार्यकाल पूरे पांच वर्ष का होता है  हालाकि मृत्यु, त्यागपत्र एवं अविश्वास प्रस्ताव आदि के चलते उसे इससे पहले भी हटाये जाने का प्रावधान है।अब जबकि मेयर का निर्वाचन सीधे नगर निगम के वोटरों द्वारा किया जाएगा तो क्या वो निगम के पार्षद के तौर पर भी निर्वाचित होगा या केवल मेयर के तौर पर, जैसा कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश एवं उत्तरखंड  में होता है जहाँ मेयर  पार्षद के तौर पर निर्वाचित नहीं होता।फिर हरियाणा में ऐसे सीधे निर्वाचित मेयर के साथ साथ क्या डिप्टी मेयर और सीनियर डिप्टी मेयर का भी सीधा निर्वाचन होगा या वर्तमान व्यवस्थां के उन्हें चुने गए पार्षदों में से ही चुना जाएगा । फिर जब मेयर का अपने पद पर सीधे निर्वाचन पूरे पांच वर्ष के लिए होगा, तो इससे पहले उसे कुछ विशेष परिस्थितियों में किस प्रक्रिया के अंतर्गत उसे हटाया जा सकेगा और क्या ऐसी स्थिति में निगम क्षेत्र में नये मेयर के लिए उप चुनाव होगा, यह देखने लायक होगा।सवाल यह है कि हरियाणा में सीधे चुने गए मेयर को मौजूदा ह.न.नि. अधिनियम, 1994  के अंतर्गत  प्रदान शक्तियों एवं कर्तव्यों में संशोधन कर उनमें कुछ और वृद्धि की जायेगी या वो ज्यों की त्यों रहेगी। हेमंत ने कहा कि खट्टर सरकार कल 7 सितम्बर से प्रारंभ हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र में इस बाबत ह.न.नि. अधिनियम, 1994  में क्या- क्या  संशोधन करती है, इस सब सब  सरकार पर निर्भर करता है।उन्होंने यह भी बताया कि अगर सीधे मेयर का चुनाव किसी उम्मीदवार द्वारा ओपचारिक पार्टी चिन्ह पर लड़ा जाता है और अगर ऐसे  सीधे निर्वाचित हुए  मेयर की पार्टी के  पार्षद अल्पमत में जीतते है या ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए कि उसका  एक भी पार्षद नहीं जीत पाए, फिर उस स्थिति में क्या नगर निगम का शासन सुचारू रूप से चल पायेगा, यह सब से महत्वपूर्ण है।हेमंत ने बताया है कि पड़ोसी हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2010 में  भी तत्कालीन प्रेम कुमार धूमल वाली भाजपा सरकार ने शिमला नगर निगम के मेयर के सीधे चुनाव  बाबत संशोधन किया था परन्तु वर्ष 2012 में तब जब आश्चर्यचकित रहे गए जब सी.पी.एम. पार्टी के संजय चौहान सीधे मेयर और उन्ही कि पार्टी के टी.एस. पंवार डिप्टी मेयर निर्वाचित हो  गए हालाकि निगम में अधिकाँश पार्षद कांग्रेस और भाजपा के ही निर्वाचित हुए और सी.पी.एम् के केवल तीन, बहरहाल इसके बाद वर्ष 2016 में तत्कालीन वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सीधे मेयर निर्वाचित करने का निर्णय को ही पलट दिया एवं पुरानी व्यवस्था लागू कर दी जिसके अनुसार पिछले वर्ष 2017में शिमला नगर निगम के चुनाव हुए। हेमंत ने बताया कि खट्टर सरकार के ताज़ा निर्णय का तात्कालिक  प्रभाव  प्रदेश के पांच नगर निगमों हिसार, रोहतक , करनाल, पानीपत और यमुनानगर पर पड़ेगा क्यूकि फरीदाबाद और गुरुग्राम नगर निगम के चुनाव पिछले वर्ष हो चुके है एवं अम्बाला और पंचकुला नगर निगम का मामला हाई कोर्ट में लंबित है। 

 
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