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Editorial

NBT EDIT -मीडिया और दलित

September 05, 2018 06:14 AM

COURTESY NBT SEPT 5

मीडिया और दलित
सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने मीडिया संस्थानों को दलित शब्द के प्रयोग से बचने की सलाह दी है। इसके लिए उसने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले का हवाला दिया है, फिर भी इस सलाह का औचित्य समझना मुश्किल है। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच का फैसला मूलत: केंद्र और राज्य सरकारों के कामकाज से संबंधित था, जिसमें कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि सारे सरकारी दस्तावेजों में दलित और आदिवासी के बदले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति शब्दों का इस्तेमाल किया जाए क्योंकि संविधान में ये शब्द कहीं नहीं आए हैं। सरकार के कामकाज में इस तरह की सख्ती समझ में आती है। लेकिन मीडिया का काम सरकार से बिल्कुल अलग है। उसको समाज में चल रही गतिविधियों की तस्वीर पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं तक पहुंचानी होती है। संविधान में दलित शब्द भले न आया हो, लेकिन देश की एक बड़ी आबादी आज साठ और सत्तर के दशकों की राजनीति से उभरे इस शब्द के साथ खुद को जुड़ा पाती है। महाराष्ट्र का दलित पैंथर आंदोलन हो या अन्य राज्यों में दिखा दलित उभार, इस शब्द ने अनुसूचित जातियों को एक नया आत्मविश्वास दिया है। कई सामाजिक, राजनीतिक संगठनों के नाम में ‘दलित’ शब्द मौजूद है। इन संगठनों की तरफ से सूचना व प्रसारण मंत्रालय के ताजा निर्देश का विरोध भी हो रहा है। अगर किसी दलित नामधारी संगठन के कामकाज से समाज का कोई हिस्सा अच्छे या बुरे रूप में प्रभावित हो रहा है तो उसकी रिपोर्टिंग करते हुए मीडिया अपनी तरफ से उस संगठन का नाम कैसे बदल देगा/ यूं भी अगर कोई समूह अपने लिए किसी संबोधन को अपमानजनक नहीं मान रहा तो किसी को भी यह अधिकार कैसे मिल सकता है कि वह उस संबोधन को अपमानजनक करार देते हुए उसका नाम बदल दे। सरकार की इस पहल से किसी को संदेह हो सकता है कि इस मामले में कोर्ट के आदेश की आड़ लेते हुए वह मीडिया के कामों में दखल देने का अनावश्यक प्रयास कर रही है। सरकार को तो अपनी यह सलाह वापस ले ही लेनी चाहिए, साथ ही अदालत को भी सोचना चाहिए कि मीडिया को उसके इस निर्देश के दायरे में शामिल करना कितना उचित है।

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