Wednesday, September 19, 2018
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Chandigarh

टैक्नोलोजी का जीवन तथा रिश्तों पर प्रभाव

August 15, 2018 07:46 PM

टैक्नोलोजी का जीवन तथा रिश्तों और सम्बन्ध-सम्पर्क, सब पर व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है। स्मार्ट फोन ने तो इस कदर जीवन को परिवर्तित कर दिया है तथा निर्भरता इस कदर बढ़ गई है कि अगर यह बंद हो जाए या खो जाए तो लगता है जीवन थम सा गया है। ह्दय अघात आने पर जैसे शरीर की सभी क्रियाएं स्थगित हो जाती हैं, वैसे ही फोन की बैटरी अगर कहीं खत्म हो जाए और फोन स्विच ऑफ जो जाए तो जीवन का प्रवाह वैसे ही रुक जाता है। क्योंकि न तो हमें किसी का फोन नम्बर याद होता है तथा न ही सूचना का मसौदा। फोन के प्रयोग का बढ़ना तथा उस पर निर्भरता एक लत या नशे का रूप लेती जा रही है। इधर फोन तो दिन प्रतिदिन स्मार्ट बन रहे हैं, उधर मनुष्य या यूं कहिए कि इसे प्रयोग करने वाले उतने ही भोंदू-डम्ब बनते जा रहे हैं। पहले समान्यत: सभी को आठ-दस जो नजदीकी व्यक्ति होते थे, उनके लैंडलाइन नम्बर याद होते थे, आज सुविधा तो बहुत हो गई, पचास सौ हजार नम्बर आपके पास उपलब्ध हैं, पर आवश्यकता पड़ने पर एक नम्बर, अपना भी याद नहीं रहता। फोन पर अतिव्यस्तता ने हमारे पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन को भी प्रभावित किया है। आपस में जोड़ने की बजाय तोड़ने का काम ज्यादा हो रहा है। अब सैल्फी की तरह ही आम चलन में एक नया शब्द फम्बिंग आया है, जिसे डिक्शनरी में भी शामिल किया गया है। यह तो शब्दों से मिलकर बना है - फोन तथा अंग्रेजी शब्द स्नविंग, जिसका अर्थ होता है अवहेलना करना। फम्बिंग का प्रयोग उस व्यवहार के लिए किया जाता है, जिसमें फोन का प्रयोग करते हुए, हमें दूसरा क्या कह रहा है, दूसरा क्या कर  रहा है, उसका पता ही नहीं होता अर्थात दूसरे की हम पूरी तरह से हवहेलना कर अपने फोन पर व्यस्त होते हैं। अक्सर यह आदेश कि ‘स्विच ऑफ योर मोबाइल’ कहीं भी पढ़ा व देखा जा सकता है। इस फम्बिंग से बचने के लिए यह आदेश जारी किया जाता है, पर अक्सर हम अपने बच्चों को देख सकते हैं कि वो अपने फोन पर इतने व्यस्त होते हैं कि उन्हें क्या कहा जा रहा है, कुछ सुन नहीं रहे होते, वो अपनी फोन की आभासी दुनिया में व्यस्त होते हैं। कक्षाओं में तो ये आम बात हो गई है। परस्पर मिलने आये ग्रुप में भी यह फम्बिंग क्रिया देखी जा सकती है, कि वे आपस में कम बात कर रहे होते हैं, अपने-अपने फोन पर ज्यादा लगे होते हैं। इसी प्रकार, पारिवारिक उत्सवों में भी फम्बिंग के चलते, आपसी सम्पर्क - मेलजोल में जो आत्मीयता होती थी, जो रस होता था, वो कम होता जा रहा है। सैल्फी की तरह फम्बिंग भी आत्ममुग्धता तथा आत्मकेन्द्रित होने का परिणाम है। सभ्यता व समाजीकरण की प्रक्रिया में सोशल मीडिया जो तेजी ला रहा है, वहीं सैल्फी व फम्बिंग जैसी क्रियाएं उसे अर्न्तमुखी भी बना रही हैं तथा केवल ‘मैं और मेरे’ तथा सीमित कर रही हैं। अपने फोन में लगे रहना, उसके सम्पर्क में बने रहना, हर सैकिंड ये चैक करना कि क्या नया मैसेज आया है, एक महामारी बनता जा रहा है। बच्चों क्या बूढ़ों सब को इस का नशा है तथा यह भी अन्य नशों व लतों की तरह खतरनाक है।

डा. क कली

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