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आर्थिक विकास भी हिंदुत्व का हिस्सा है'

August 09, 2018 06:16 AM

COURSTEY NBT AUG 9

आर्थिक विकास भी हिंदुत्व का हिस्सा है'

 

संघ चाहता है कि मुसलमान गो हत्या, राम मंदिर और आर्टिकल 370 के मुद्दे पर उनका कहा मानें। इसमें परस्पर हितों की बात कहां है/

कुछ मुद्दों पर संघ अपने कदम खींच रहा है। पूर्व की तरह संघ उन मुद्दों पर कठोरता नहीं दिखा रहा। कुछ क्षेत्रों में संघ समझौतावादी हो रहा है। जैसे, उत्तर पूर्व में, बीफ खाना सामान्य बात है, जिस पर संघ को आपत्ति नहीं है और वहां संघ बीफ बैन का दबाव नहीं बनाता।

 

वैचारिक लचीलापन कहीं चुनावों के मद्देनजर तो नहीं है/

पहले की अपेक्षा संघ अब वैचारिक रूप से बहुत ज्यादा लचीला हो चुका है। लेकिन हमें संघ और बीजेपी में अंतर समझना होगा। संघ बीजेपी नहीं है और वह इसे लेकर एकदम दृढ़ है। संघ के अंदर बीजेपी को लेकर एक आशंका बनी रहती है- कि ये लोग सत्ता के बहुत ज्यादा भूखे हैं और अहंकारी हैं।

 

2019 के चुनाव में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती/

अर्थव्यवस्था। सवाल है कि क्या मोदी युवाओं के लिए नौकरियां पैदा कर पा रहे हैं। यह वर्ग शहरों ही नहीं, गांवों में भी है।

 

संघ के लिए हिंदुत्व अब क्या है/

राष्ट्रीय संस्कृति। इसका मतलब गैर हिंदुओं के प्रति असहनशीलता नहीं है।
वाल्टर एंडरसन भारत के दक्षिणपंथ के प्रमुख स्कॉलर हैं। उन्होंने 1987 में श्रीधर दामले के साथ मिलकर 'द ब्रदरहुड इन सैफ्रन' किताब लिखी थी। तीन दशक बाद वे एक नई किताब 'द आरएसएस : अ व्यू टु द इनसाइड' लेकर आ रहे हैं, जो संघ के बारे में विस्तार से बताती है। चार्मी हरिकृष्णन ने जॉन हॉप्किंस यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ सहायक प्रफेसर एंडरसन से खास बात की :
आपकी किताब 'द ब्रदरहुड इन सैफ्रन' के 30 साल बाद दूसरी किताब 'द आरएसएस' आ रही है। इस दौरान आरएसएस में क्या बदलाव देखते हैं/

इन 30 सालों में आरएसएस ने काफी विस्तार कर लिया है। अब इस संगठन में काफी ज्यादा विविधता भी है। तमाम संगठनों से जुड़कर इसने भारतीय समाज के लगभग हर हिस्से में अपना दखल बढ़ा लिया है। भारत का सबसे बड़ा मजदूर संघ, भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) आरएसएस से जुड़ा है। सबसे बड़ा छात्रों का संगठन, एबीवीपी, के अलावा 36 संगठन हैं जो पूरी तरह संघ से जुड़े हुए हैं, जबकि सैकड़ों ऐसे संगठन हैं जो संघ से जुड़ना चाहते हैं। जितने ज्यादा संगठन उतना ही संघर्ष की गुंजाइश भी रहती है। जैसे बीएमएस और स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) एफडीआई के मुद्दे पर विरोध करती हैं, जबकि सरकार और बीजेपी इसके पक्ष में हैं। आरएसएस इस विवाद में सबसे बड़ा मध्यस्थ बनकर उभरा है। यह अब इसका सबसे बड़ा काम बन गया है। 30 साल पहले ऐसा नहीं था। तब आरएसएस का काम शाखाओं में चरित्र निर्माण का था।

 

नरेंद्र मोदी से मुलाकात का आपने एकबार जिक्र किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि आर्थिक विकास हिंदुत्व का केंद्रीय तत्व है। क्या आप उस मीटिंग के बारे में कुछ बता सकते हैं/

उस समय मैंने उनसे पूछा था कि हिंदुत्व का मतलब क्या है/ तो उन्होंने कहा था कि हिंदुत्व में आर्थिक तत्व समाहित हैं- रोजगार, खुशहाली इसका हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि मजबूत भारत बनाने के लिए ये चीजें जरूरी है - निचले स्तर के लोगों को ऊपर उठना होगा और यह केवल आर्थिक विकास से ही संभव है।

 

आपने कहा कि एफडीआई के मुद्दे पर संघ बीजेपी और एसजेएम के बीच मध्यस्थता करता है/

10-15 साल पहले आरएसएस एफडीआई के मुद्दे पर फरमान जारी करता- और उसने किया भी। पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन एफडीआई के सख्त खिलाफ थे। अब ऐसा नहीं है। मौजूदा नेतृत्व देख रहा है कि सरकार क्या करने का प्रयास कर रही है। हालांकि अब भी संघ में एक मजबूत विचार ये है कि एफडीआई देश हित में नहीं है।

 

वाजपेयी सरकार और मोदी सरकार के संघ से संबंधों को लेकर किस तरह का अंतर देखते हैं और राम मंदिर और धारा 370 जैसे मुद्दों पर क्या रुख है/

पीएम वाजपेयी के समय में अलग तरह के सरसंघचालक, सुदर्शन थे, जो कि अपेक्षाकृत कम कूटनीतिक थे और ज्यादातर वह हार्डलाइनर थे, जबकि भागवत मोदी से खुलकर मिलते हैं और अपनी असहमतियां जताते समय वह अत्यधिक कूटनीतिक होते हैं। उनके बीच समन्वय ज्यादा है ताकि तमाम मुद्दों पर परदे के पीछे समाधान निकाला जा सके। जिस मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाती, उसमें वे संघ की प्रकृति पर आ जाते हैं- अगर आप किसी समाधान पर नहीं पहुंचे, तो उसे एक किनारे रख दें, और जब आप विचार कर सकते हैं तब दोबारा उस मुद्दे पर लौटें।

 

और मोदी-भागवत संबंधों ने इसमें सहयोग दिया/

वे लगभग समान उम्र के हैं। मोदी प्रचारक थे। मैंने मोदी और भागवत से एक दूसरे के बारे में पूछा, और उन्होंने समान रूप से सकारात्मक संकेत दिए। वे जानते हैं कि उन्हें एक दूसरे की जरूरत है और दोनों ही एक दूसरे की सीमाओं का सम्मान करते हैं। 2015 में बिहार चुनाव के दौरान भागवत ने आरक्षण के पुनर्विचार का मुद्दा उठा दिया था, जिस पर भूचाल मच गया था। इस पर उन्होंने तत्काल सफाई पेश की। तब से ही, वे उस मुद्दे को लेकर अत्यधिक सतर्क रहते हैं।

 

धर्म एक ज्वलंत मुद्दा है। एनआरसी की आलोचना हो रही है कि यह मुस्लिम शरणार्थियों को अलग कर रहा है। वहीं नागरिकता (संशोधन) बिल में बाहरी हिंदुओं को नागरिकता देने का प्रस्ताव है।

शरणार्थियों का मुद्दा पूरे विश्व में छाया हुआ है। भारत में भी यह बड़ा मुद्दा है, खास तौर पर असम में। गृह मंत्री ने कहा है कि जो छूट गए हैं उन्हें दोबारा शामिल होने का मौका मिलेगा। वे उम्मीद कर रहे हैं कि यह मुद्दा धीरे-धीरे शांत हो जाएगा। हालांकि, ऐसा लगता नहीं है।

 

दलित मुद्दे पर संघ की सोच/

बीजेपी और संघ, दोनों ही जाति आधारित राजनीति पर सहज नहीं हैं क्योंकि दोनों ही जिस एकता की बात करते हैं, जाति की वजह से वह हल्की हो जाती है। इसलिए वे अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में समानता की बातों को आगे बढ़ाते हैं। वे वर्गीकरण के विचार को खत्म करना चाहते हैं- इसलिए वे अपने नामों के साथ जाति का उल्लेख नहीं करते हैं। संघ कार्यकर्ता एक दिन नाली साफ करते हैं तो दूसरे दिन भोजन परोसते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को दलितों का समर्थन मिला था, लेकिन अब यह घटता हुआ लग रहा

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