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भारत दासता सूचकांक में फिर आगे ?

July 31, 2018 06:39 PM

यू.एन.ओ. ने विश्व दासता सूचकांक जारी करते हुए जुलाई 30 को मानवीय तस्करी के खिलाफ दिन घोषित किया है तथा 2030 तक पूरे विश्व से बंधुआ मजदूरी तथा आधुनिक दासता को समाप्त करने का वैश्विक उद्देश्य निश्चित किया है। यह जानकर अत्यंत क्षोभ होता है कि इसी रिपोर्ट के अनुसार भारत में दासता में जीवन जी रहे लोगों की संख्या 8 मिलियन हैं तथा जो विश्व में सबसे अधिक है, ग्लोबल सलेवरी इंडैक्स - वैश्विक दासता सूचकांक में भारत सबसे आगे है। इसी रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 40 मिलियन लोग आज भी दासता का जीवन जी रहे हैं, जिसमें से 25 मिलियन बंधुआ मजदूरी में जकड़े हैं तथा 15 मिलियन वैवाहिक बंधनों (क्रय-विक्रय) के कारण से दासता में फंसे हैं। यह पढ़कर, सुनकर हृदय को कचोटता है कि राजनैतिक रूप से स्वतंत्रता हासिल करने के बाद भी पूरे विश्व में आर्थिक, सामाजिक व अन्य कारणों से दासता की प्रथा जारी है।  यह विश्व में सबसे बड़ी आपराधिक गतिविधि के रूप में फैक्ट्रियों, खेतों, घरों में शोषित मानवता, मानव शरीर व उसके अंगों में तस्करी, भिक्षावृति में बच्चों  व औरतों से जबरदस्ती के रूप में जहां-तहां देखी जा सकती है। मनुष्य तथा उसके शरीर व अंगों  में व्यापार न केवल जघन्य अपराध है, अपितु सभ्यता के विकास पर बदनुमा दाग भी है, पर लाभ व पैसा कमाने के लिए मनुष्य न केवल स्वयं को, बल्कि अन्य, अपनी स्त्री व बच्चों को भी बेच रहा है। ‘पराधीन सपनेहूं सुख नाही’ तथा ‘स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्घ अधिकार है’, का नारा लगाने वाले देश में दासता के संदर्भ में हम पूरे विश्व में सबसे आगे खड़े हैं। इसके पीछे आर्थिक, सामाजिक  व सांस्कृतिक कारण खोजे जा सकते हैं। आर्थिक विकास के जो मॉडल हम अपना रहे हैं, उनमें अमीर और अमीर हो रहा है तथा गरीब और गरीब हो रहा है। दोनों के बीच में खाई बढ़ती जा रही है, परिवार विघटन हो रहे हैं, सामाजिक ताना-बाना इस कदर टूट रहा है कि मनुष्य केवल स्व के हित वर्धन तथा लाभ अर्जन पर केन्द्रित हो रहा है। सांस्कृतिक मूल्य निरंतर तिरोहित हो रहे हैं, प्रतियोगिता अधारित बाजार व्यवस्था ने उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया है, सुख तथा सुविधाओं की बढ़ती लालसा ने ऐसी जीवन शैली बना दी है, जिसमें मनुष्य का शोषण, उसकी अवहेलना तथा दासता बढ़ती जा रही है। एक तरफ गरीबी के उन्मूलन तथा आर्थिक  विकास की गति तेज करने के लिए उत्कृष्ठ प्रयास किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी और मनुष्य, मनुष्य को दासता की ओर धकेल रहा है।  आर्थिक परतंत्रता बढ़ती आवश्यकताओं तथा दुर्लभ आर्थिक साधनों के बीच होड़ का परिणाम है। सामाजिक व सांस्कृतिक कारण भी इस स्थिति के लिए बहुत हद तक जिम्मेवार है। संस्थागत कारण भी इस बढ़ती दासता सूचकांक के लिए जिम्मेदार हैं। विश्वगुरु बनने की चाह रखने वाले देश का, वैश्विक दासता सूचकांक में सबसे आगे रहना शर्म से सर झुका देता है। बढ़ती दासता का स्तर हमारी सभ्यता व संस्कृति के मुंह पर तमाचा तो है ही, साथ  में यह इस बात का भी प्रतीक है कि संविधान प्रदत्त अधिकारों को सरकारें कैसे आम व्यक्ति या नागरिक को उपलब्ध कराने में तथा उनकी रक्षा करने में असफल रही है। अंत में -

‘जीतकर भी गया जंग हार आदमी,

कितना नादान है, होशियार आदमी,

जाने किन मौसमों के हवाले हुआ आदमी,

आदमी को नहीं साजगार आदमी,

अपने साये के पीछे चले जा रहा आदमी,

एक खंजर लिए तेज धार लिए आदमी,

प्यार की साख पर आज बाजार में नफरतों का करे कारोबार आदमी।’ 

डा० क. कली 

 

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