Friday, October 19, 2018
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Haryana

क्रोनी कैपिटल्जिम का नया दौर

July 31, 2018 01:21 PM
राजनीति और अर्थशास्त्र- राजनेता और व्यवसायी- उद्योगपति और सरकारें, ये कुछ ऐसे सम्बन्ध-संयोग हैं कि आए दिन चर्चा में आते रहते हैं। विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री व भाजपा के कुछ विशेष उद्योगपतियों से सम्बन्ध तथा उन्हें फायदा पहुंचाने पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं तथा उन्हें ‘‘सूट-बूट की सरकार’’ कहकर उन पर क्रोनी कैपिटल्जिम के बढ़ावे का आरोप लगता रहा है। लखनऊ में इन्वेस्टर्स समिट के दौरान प्रधानमंत्री ने इस पर प्रतिक्रिया स्वरूप कड़े शब्दों में अपना रूख स्पष्ट कर दिया कि वे उद्योगपतियों की बगल में खड़े होने से नहीं डरते। उन्होंने उद्योगपतियों के सम्मान को जरूरी बताया तथा देश के आर्थिक विकास, रोजगार सृजन तथा देश के निर्माण में उनके योगदान को अपरिहार्य बताया। उद्योगपतियों को चोर-लूटेरा कहने पर भी उन्होंने आपत्ति जतायी। महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि गांधी जी भी बिड़ला सेठ के परिवार के साथ रहते थे, क्योंकि उनकी नीयत साफ थी, उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। ये सब विचार उन्होंने तब व्यक्त किये जब वे अमर सिंह, जो कि राजनेता व उद्योगपति हैं, के साथ राजनीतिक गलबहियां कर रहे थे। अपने गुजराती उद्योगपति भाइयों जैसे कि अम्बानी व अदानी के सम्बन्धों पर लगातार चर्चा पर घिरे मोदी जी ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि उन्हें उद्योगपतियों तथा उनके पैसे से अपनी पार्टी को आगे बढ़ाने तथा सत्ता हासिल करने में कोई गुरेज नहीं तथा न ही वह इस मुद्दे पर किसी से भयभीत हैं। एक तरफ भ्रष्टाचार को खत्म करने का दावा मोदी जी करते हैं और अपनी 56 इंची छाती फैलाकर कहते हैं कि ‘‘न मैं खाऊंगा, न ही खाने दूंगा’’ पर भ्रष्टाचार की गंगोत्री कहां से निकलती है? ईमानदार व साफ नीयत वाले राजनेता व उद्योगपति, जो आर्थिक विकास को आगे ले जाए, रोजगार सृजन करे, निवेश बढ़ाए, देश में हैं कहां? नीरव मोदी व मेहुल चौकसी, जो कि पंजाब नैशनल बैंक को खोखला करके तथा अन्य बैंकों को चूना लगा, विदेश में भाग गए हैं, ने भी मोदी जी की बगल में खड़े होकर फोटो खिंचवाई थी। प्रश्न तो राजनैतिक सत्ता व उसके सम्पर्क से लाभ उठाने का है। सत्ता के सामीप्य से नियमों व कायदों को तोड़ स्वहित के लिए बड़े-बड़े व्यवसाय खड़े कर लाभ तो अपनों के लिए तथा घाटे पब्लिक को हस्तांतरण करना, सार्वजनिक वित्त संस्थाओं को चूना लगा, उच्च जीवन स्तर जीना, कुछ भारतीय उद्योगपतियों तथा व्यवसायियों का शुगलमेला बन गया है। इस तथ्य से तो सभी वाकिफ हैं के औद्योगीकरण करो व नष्ट हो जाओ- इण्डस्ट्रीयलाइज या पेरिश पर सही मायनों में औद्योगिक विकास हो कहां रहा है? कारोबारियों, व्यापारियों तथा उद्योगपतियों द्वारा ही किसी देश में आर्थिक विकास होता है तथा सभी जानते हैं कि अर्थसत्ता तथा राजसत्ता आपस में सहयोग से किसी भी राष्ट्र के निर्माण में बहुत बड़ी भूमिका होती है, लेकिन ये तब होता है जब सर्वभूत हिताय:, सर्वभूत सुखाय से दोनों प्रेरित हो। लेकिन आज तो जो देखा जा रहा है, वो क्रोनी कैपिटल्जिम अर्थात राज्य के संरक्षण में पूंजीवाद फल-फूल रहा है। यही देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ है। राजनेता सत्ता में बने रहने के लिए उद्योगपतियों से पैसा व आर्थिक सहयोग लेते हैं, बदले में उन्हीं को ही फायदा पहुंचाने के लिए कानून व नियम बनाते हैं। सरकार को उद्योगपतियों से गलबहियां करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं है। सरकार को व्यवसाय करने के अनुकूल वातावरण बनाना, निवेश में आने वाली दिक्कतें दूर करना, उद्योग-धंधे पनपे तथा फले-फूले, उनके लिए सहयोग करना जरूरी है, पर विशेष उद्योगपतियों की बगल में खड़े होना तथा प्रधानमंत्री के रूप में उनसे सामीपय तथा निकटता स्थापित कर उसे विज्ञापित करना क्रोनी कैपिटल्जिम नहीं तो क्या है? (डॉ० क० ‘कली’)
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