Sunday, August 19, 2018
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मूल मुद्दों से भटकाती बाजार व्यवस्था

July 25, 2018 07:11 PM
मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था ने जीवन को सरल बनाने की बजाय जटिल बना दिया है। हम चहुं ओर अगर दृष्टि डालें तो प्रतीत होता है कि जीवन में जो भी गैर जरूरी है, उस पर तो ध्यान है तथा वह वृद्धि को पा रहा है, पर जो जरूरी है, उसको नजरअंदाज किया जा रहा है। अब हम जीवन में केन्द्र पर न जा परिधि पर टिके हैं तथा इसके ही विस्तार में लगे हैं। उपभोग जीवन में सर्वोपरि हो गया है तथा उत्पादन गौण हो गया है। उत्पादन के क्षेत्र में भी क्रियाएं जो मूलभूत वस्तुओं के सृजन तथा निर्माण पर न टिक उनके वितरण तथा मार्केटिंग पर ज्यादा केन्द्रित है। दूर जाने की जरूरत नहीं, छोटे-छोटे उदाहरण जैसे कि निजी क्षेत्र के महंगे स्कूलों की ही ले लीजिए। स्कूलों की फीस तो मध्यमवर्ग के लिए कमरतोड़ू है ही, उसके साथ महंगी ड्रैस जो कि कुछ विशेष दुकानों, जिनसे स्कूल प्रशासन की मिलीभगत होती है, महंगी तथा भारी-भरकम पुस्तकें व बैग, फिर नाना प्रकार की एक्टीविटीज पर खर्च ये सब शिक्षा संस्थानों के मूल उद्देश्य से विकेन्द्रित तथा भटकती नजर आती है। गोयाकि विद्यार्थी के लिए ज्ञान अर्जन गौण तथा ये ऊपरी दिखावा ज्यादा महत्त्वपूर्ण तथा स्कूल प्रबंधन को भी शिक्षा से मुनाफा हो न हो, इन दूसरी अन्य क्रियाओं से मोटा लाभ होता ही है। इसी तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में, शिक्षा की तरह जो मानवीय संसाधनों की कुशलता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, उसमें ही यही सब कुछ हो रहा है। चिकित्सा, दवाइयों इत्यादि पर इतना खर्च नहीं होता, जितना डॉक्टर द्वारा बताए गए महंगे टैस्ट्स, एक्स-रेज, एमआरआई तथा अन्य जरूरी व गैर जरूरी परीक्षणों तथा जांच इत्यादि पर खर्च होता है। चिकित्सालयों के लिए भी तथा डॉक्टरों के लिए भी ये ज्यादा फायदे का सौदा है, क्योंकि डॉक्टरों को मोटा कमीशन मिलता है तथा संस्थान प्रबंधकों को अतिरिक्त लाभ। गोयाकि हैल्थकेयर इण्डस्ट्री के लिए रोगी की हैल्थ से ज्यादा महत्त्वपूर्ण उसकी अपनी आर्थिक हैल्थ है, जो मुनाफाखोरों पर टिकी है। इसी तरह मनोरंजन के क्षेत्र में भी यही हो रहा है। मल्टीप्लैक्स में फिल्म देखने के लिए टिकत पर उतना व्यय नहीं होता, जितना वहां आने-जाने व पार्किंग का होता है, उस पर वहां पॉपकॉर्न खाने तथा सॉफ्ट ड्रिंक पीने पर होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि बाजार का विस्तार तथा प्रसार इस हद तक हो गया है कि जिस चीज में मुनाफा है, लाभ है, वही महत्त्वपूर्ण है, चाहे वह मूल उद्देश्य से कितनी भी दूर क्यों न हो तथा मूल उद्देश्य से चाहे तो ध्यान भी भटकाती हो। यह बात अर्थव्यवस्था पर लागू हो रही है। सैंसेक्स गगनचुम्बी हो गया है, निरंतर बढ़ रहा है। विकास की दर बढ़ रही है। जीडीपी की दृष्टि से हम विश्व में छठे स्थान पर पहुंच गए हैं। पर यक्ष प्रश्न रोजगार कितना बढ़ा है? गरीबी कितनी घटी है? ग्रामीण इलाकों में जीवन स्तर में सुधार हुआ है या नहीं, ये सब प्रश्न अनुत्तरित हैं तथा ओट में चले गए हैं। इण्डिया शाइनिंग के पीछे गिरियाता भारत, क्यों नहीं दिखाई देता? आज हम विकास के पौधे की कांट-छांट पर तो ध्यान दे रहे हैं, पर उसकी जड़ें हरी हैं या नहीं, जड़ों पर कोई ध्यान नहीं है। जैसे पौधे की वृद्धि और विकास, उसकी जड़ों पर निर्भर करता है, वैसे ही जीवन में मूलभूत क्रियाएं ही उसे बल व वीर्य प्रदान करती है। केन्द्र पर न टिककर, परिधि को विस्तार देना, कहां की बुद्धिमत्ता है? ऐसा विकास तथा विस्तार उस दीपक की तरह है, जो प्रकाश तो देता ही नहीं। हां ताप और धुआं जरूर बढ़ा देता है। अंत में, ‘‘काम जो गैर जरूरी है, वो सब करते हैं, और हम कुछ नहीं करते, तो गजब करते हैं।’’ (डॉ० क० ‘कली’)
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