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National

लोकतंत्र पर हावी भीड़तंत्र

July 18, 2018 06:02 PM
देश में बढ़ते भीड़तंत्र पर सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई है। भीड़ के हाथों लोगों की पिटाई, पीट-पीटकर हत्या किये जाने की घटनाओं को प्रभावी तरीके से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने संसद से नया कानून बनाने व दोषी को कठोरतम सजा देने पर विचार करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा ‘‘अगर भीड़ ही जज बने तो कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए।’’ लेकिन भीड़तंत्र आज भारत में लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। प्रशासन तो पंगु नजर आता ही है, जब भीड़ न्याय, कानून व्यवस्था सब अपने ही हाथों में लेकर हिंसा पर उतर आती है। कारण कोई भी हो, चाहे वह ‘‘गौ रक्षा का मामला हो’’ या ‘‘जातिगत भावनाओं के आहत होने का’’ या ‘‘बच्चे उठाने के गिरोह की अफवाह’’ से उन्मादी भीड़ हिंसा, तोड़-फोड़ व हत्या जैसे जघन्य अपराध देश में अव्यवस्था तथा अशांति पैदा कर रही है। हाल के दिनों की घटनाएं देश में जीवंत, बहुलतावादी और सफल लोकतंत्र के लिए चुनौती बनकर उभरी है तथा विश्व स्तर पर भारत की छवि भी खराब कर रही है। कहते हैं कि भीड़ की अपनी पहचान होती है तथा हर व्यक्ति भीड़ में अपनी पहचान खो देता है। अत: उसमें छिपी पाश्विकता तथा हिंसक, बदला लेने की प्रवृत्तियां हावी हो जाती हैं। इसलिए ही कहा जाता है कि भीड़ का अपना मनोविज्ञान होता है, जहां केवल उत्तेजक भावनाएं तथा प्रतिक्रियाएं होती हैं। बेकाबू भीड़ का अपना कोई दिमाग नहीं होता अर्थात भीड़ से विवेकपूर्ण व्यवहार की आशा करना व्यर्थ है। टैक्नोलॉजी और सोशल मीडिया ने इस भीड़तंत्र को नियंत्रणहीन सूचना व ज्ञान सामग्री उपलब्ध करवा तथा उसका तेज प्रसार कर इन घटनाओं की पुनरावृत्ति में सहयोग दिया है। आज भीड़तंत्र जहां-जहां अपनी मनमानी कर आम व्यक्ति के जीवन के लिए खतरा तथा नागरिक के अधिकारों को हड़पकर भयावह गतिविधियों को अंजाम दे रही है। प्रशासन तथा पुलिस व्यवस्था नेत्रहीन व गूंगे-बहरे की तरह खड़ी अपाहिज दिखाई देती है। इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट ने इससे निपटने के लिए राज्य तथा केन्द्र सरकार को कठोर कदम उठाने तथा नयी कानून व्यवस्था का प्रबंध करने के लिए कहा है। अगर भीड़ ने स्वयं ही सडक़ पर छानबीन, ट्रायल, निर्णय और सजा देनी है, तो विधानपालिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका का औचित्य ही क्या है? लोकतंत्र की अवधारणा, संविधान के निहित मूल्य और सिद्धांत सबको यह भीड़तंत्र का भस्मासूर खत्म कर देगा। भीड़ द्वारा उन्मादी व्यवहार, उपद्रव, हिंसा, तोड़-फोड़ का चलन तथा पैमाना बढऩे के साथ विकराल भी हो रहा है। इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए तथा समर्थन करने वालों के विरूद्ध भी कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए। अन्यथा न केवल हमारी प्रतिष्ठा वैश्विक स्तर पर खराब होगी, बल्कि आधुनिक, समृद्ध, सम्पन्न तथा सभ्य भारत का सपना भी चकनाचूर हो जाएगा। राजनायकों तथा राजनेताओं को इस भीड़तंत्र रूपी जिन्न को अपने स्वार्थों के लिए प्रयोग करने से बाज आना चाहिए, क्योंकि अनियंत्रित भीड़ का जिन्न बेकाबू होने पर सबके लिए संहारक बन जाता है। विभाजन की त्रासदी तथा परस्पर मारकाट के जख्म जो अभी भी हरे हैं, इसी उन्मादी भीड़तंत्र का उदाहरण है। (डॉ० क० ‘कली’)
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