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समलैंगिकों की शादी या लिव इन पर सुप्रीम सुनवाई नहीं ‘160 साल पहले की कसौटी से तय न हो नैतिकता’

July 11, 2018 06:10 AM

COURSTEY NBT JULY 11

समलैंगिकों की शादी या लिव इन पर सुप्रीम सुनवाई नहीं


‘160 साल पहले की कसौटी से तय न हो नैतिकता’
याचियों के वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि समलैंगिकता यौन संबंधों के प्रति रुझान का मुद्दा है, इसका जेंडर से लेना-देना नहीं है। एलजीबीटी समुदाय भी समाज का एक तबका है, सिर्फ उसका यौन रुझान अलग है और यह वंशानुगत है। रोहतगी ने यह भी कहा कि समाज के साथ मूल्य भी बदल रहे हैं। 160 साल पहले के ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के नैतिक मूल्यों से प्राकृतिक सेक्स को परिभाषित नहीं किया जा सकता। निजता के अधिकार पर फैसला देने वाली 9 जजों की पीठ के 6 जजों ने भी माना था कि धारा 377 को आपराधिक दायरे में लाया जाना गलत था। रोहतगी ने कहा कि किसी रिश्ते को समाज कैसे देखता है, इसके बजाय हमें उसे संवैधानिक कसौटी पर परखना होगा। 8पेज 13• विशेष संवाददाता, नई दिल्ली

 

समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर करने की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि वह एलजीबीटी कम्यूनिटी की शादी या फिर लिवइन रिलेशनशिप के मुद्दे को नहीं देखेगी। चीफ जस्टिस की अगुआई वाली पांच जजों की पीठ ने कहा कि हम सिर्फ IPC की धारा-377 की वैधता परखेंगे। इससे पहले याचियों की ओर से मुकुल रोहतगी ने कहा कि कोर्ट धारा 377 के अलावा समलैंगिक जोड़े की जिंदगी और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भी निर्देश दे, जिसका केंद्र के वकील ने विरोध किया।

IPC की धारा 377 में समान जेंडर वाले दो वयस्कों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध अपराध माना गया है और सजा का प्रावधान है। इस धारा को खत्म करने की सुनवाई में रोहतगी ने दलील दी कि समलैंगिकता यौन संबंधों के प्रति रुझान का मुद्दा है, इसका जेंडर से लेनादेना नहीं है। एलजीबीटी समुदाय भी समाज का एक तबका है, सिर्फ उसका रुझान अलग है और ये इस रुझान के साथ पैदा हुए हैं। इस पर कोर्ट ने पूछा कि क्या समलैंगिकता प्राकृतिक होती है, तो रोहतगी ने कहा- हां।

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