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Delhi

HARYANA-केन्द्रों पर बिना जांच 20 मिनट में मिल रहा पीयूसी सर्टिफिकेट

July 11, 2018 05:06 AM

COURSTEY DAINIK BHASKAR  JULY 11
केन्द्रों पर बिना जांच 20 मिनट में मिल रहा पीयूसी सर्टिफिकेट

रियलिटी चैक | इरडाई के नए आदेश-पीयूसी सर्टिफिकेट के बिना नहीं होगा वाहनों का बीमा

काला धुंआ फेंकने वाली 2001 माॅडल कार का 20 मिनट में दे दिया फिटनेस सर्टिफिकेट
विभिन्न जिलों में बाइक से लेकर कार तक की करवाई जांच, बिना चैक किए फोटो लेकर बना रहे सर्टिफिकेट

 

भास्कर न्यूज | पानीपत/ सिरसा/ रोहतक
प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के खिलाफ बीमा नियामक संस्था इरडाई ने मंगलवार को नए आदेश जारी किए। इनमें कहा गया है कि अब किसी भी वाहन को पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल (पीयूसी) सर्टिफिकेट के बिना बीमा नहीं दिया जाएगा। इरडाई ने बीमा कंपनियों को निर्देश भेज दिए हैं। इरडाई ने अपनी तरफ से भले ही आदेश जारी कर दिए हैं, लेकिन इसका प्रदूषण पर कोई असर पड़ेगा या नहीं, यह जांचने के लिए हमने हरियाणा के विभिन्न शहरों में स्थित वाहन प्रदूषण जांच केंद्रों की पड़ताल की। जहां पुराने माॅडल की बाइकों से लेकर काला धुंआ फेंकने वाली कारों तक की जांच करवाने के लिए ले गए।
इस जांच के दौरान जो सच्चाई सामने आई वो काफी चौंकाने वाली है। प्रदेश में इस तरह के केन्द्रों पर बिना जांच किए केवल नंबर प्लेट का एक फोटो मात्र लेकर प्रदूषण फिटनेस का सर्टिफिकेट 20 मिनट में जारी किया जा रहा है। विभिन्न पेट्रोल पंपों पर इस तरह के जांच केंद्र खोल कर बैठे लोगों को प्रदूषण से कोई लेना-देना ही नहीं है। पैसे के लिए वे किसी भी तरह के वाहन का सर्टिफिकेट जारी कर देते हैं। पूरे प्रदेश में फर्जी तरीके से प्रदूषण प्रमाण पत्र बनाने का खेल चल रहा है। इस फर्जीवाड़े में न तो आपके वाहनों को चेक किया जाता है और न ही उसे चलवाकर देखा जाता है। बस काउंटर पर बाइक खड़ी कीजिए, फोटो खिंचवाइए और हाथों-हाथ प्रदूषण प्रमाण पत्र तैयार।
इन तीन मामलों से समझिए जांच केन्द्रों की हकीकत
सिरसा शहर में हम एक व्यक्ति की वर्ष 2001 मॉडल मारुति कार जो कंडम हालत में है और बिलकुल काला धुआं छोड़ती है, उसका प्रदूषण जांच सर्टिफिकेट बनवाने ले गए। प्रदूषण जांच केंद्र के संचालक ने बिना प्रदूषण जांच मशीन लगाए ही कार की फोटो खींची और प्रमाण पत्र निकालकर दे दिया। इसमें गाड़ी को बिलकुल फिट बताया गया है, लेकिन सड़क पर वही कार काला धुआं निकालती चली। इसी कार को दूसरे प्रदूषण जांच केंद्र पर ले जाया गया और मशीन लगाकर जांच की गुजारिश की ताे मशीन ने प्रमाण पत्र निकालने से इनकार कर दिया और कहा कि इसका सर्टिफिकेट नहीं बन सकता। उसने जांच करके यह जरूर बताया कि इसमें धुंए की क्या रिपोर्ट है। इसमें सामने आया कि उस गाड़ी में तय मानकों से चार गुणा अधिक प्रदूषित धुंआ निकल रहा था।
केस : 1
पानीपत के सेक्टर 25 स्थित एक इंडियन ऑयल के पेट्रोल पंप वाले प्रदूषण जांच केंद्र पर एक बाइक को लेकर गए। इस बाइक की सर्विस हुए 3 महीने हो गए हैं और काला धुआं निकालती है। यहां भी न बाइक चलवाकर देखी गई, न ही आरसी देखी। केवल 20 मिनट में सर्टिफिकेट बनाकर दे दिया। संचालक ने बताया कि रोजाना औसतन 30 वाहनों की वह जांच कर देता है। अब सोचिए इस तरह हर महीने वो कितने प्रदूषित वाहनों की जांच करता होगा।
केस : 2
रोहतक में भी पेट्रोल पंपों पर प्रदूषण सर्टिफिकेट बिना प्रदूषण के जांच कर ही दिए जा रहे हैं। प्रदूषण कंट्रोल केंद्र पर सिर्फ वाहन की नंबर प्लेट का फोटो खींचकर कंप्यूटर से प्रिंट निकालकर देते हैं। छह महीने के 50 और एक साल के 120 रुपए लेते हैं। इस वक्त न तो कोई प्रदूषण जांच करता और न ही वाहन की आरसी चेक करता। माॅडल नंबर बताते ही प्रदूषण नियंत्रित प्रमाणपत्र मिल जाता है। यहां तो एक प्रदूषण कंट्रोल केंद्र संचालक केवल एक मिनट में बाइक का फोटो खींचकर, इसके बाद कहा कि 15 मिनट से 20 मिनट बाद आकर सर्टिफिकेट ले जाना। दोबारा पहुंचे तो बाइक का फिटनेस सर्टिफिकेट तैयार था।
केस : 3
ये हैं बाइक प्रदूषण जांच केन्द्र के नियम
जांच केंद्र संचालक के पास हरियाणा का रिहाइशी प्रमाण पत्र हो।
केंद्र में प्रदूषण जांच के लिए स्मोक मीटर होना चाहिए, जिसे गाड़ी के सायलेंसर पर लगाकर प्रदूषण मापा जाए।
प्रदूषण जांचकर्ता के पास इलेक्ट्रिकल का डिप्लोमा होना चाहिए।
कम से कम 10 गज जगह होनी चाहिए।
डिजिटल कैमरा होना चाहिए।
ये है हकीकत
जांच केन्द्र संचालक प्रशासन से आवेदन तो खुद करते हैं, लेकिन बाद में कोई कारिंदा बिठा दिया जाता है।
नाममात्र जांच केन्द्रों पर ही स्मोक मीटर लगे हैं।
कारिंदों के पास किसी प्रकार का कोई डिप्लोमा नहीं।
महज 4 फुट के एक कैबिन में बैठकर प्रदूषण जांच केन्द्र चलाया जाता है।
ऐसे आदेशों का कोई फायदा नहीं : एक्सपर्ट
प्रदूषण मामलों के विशेषज्ञ डॉ मनोज कुमार ने बताया कि बीमा कंपनियों को जो ये आदेश जारी किए गए हैं। इनका कोई फायदा नहीं है। जांच केन्द्रों पर जब तक इस तरह के फर्जी सर्टिफिकेट बनते रहेंगे, तब तक कुछ नहीं होने वाला। लोग केवल चालान से बचने के लिए यह पर्ची बनवाते हैं। केंद्रों के संचालकों को केवल पैसों से मतलब है। लोग जब तक वाहनों के धुंए से होने वाले प्रदूषण की गंभीरता को नहीं समझेंगे, तब तक कोई स्थाई समाधान नहीं हो सकता है। सरकार को भी इसके प्रति सख्त होने की जरूरत है।
ये हैं तय मानक
वाहन : सीओ(कार्बन माेनो ऑक्साइड)% : एचसी(हाइड्रो कार्बन)
टू-व्हीलर्स(31 मार्च 2000 से पहले वाले): 4.5: 9,000
टू व्हीलर्स (31 मार्च 2010 तक): 3.5 : 6,000
टू व्हीलर्स (31 मार्च 2010 के बाद वाले): 3.0 : 4,000
फोर व्हीलर्स प्री भारत स्टेज -2 : 3.0: 15,00
फोर व्हीलर्स भारत स्टेज-2 और स्टेज-3 : 0.5: 750

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