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आज का सामाजिक तथा पारिवारिक तानाबाना

July 10, 2018 06:20 PM
मानवीय सभ्यता का इतिहास अगर देखा जाए तो सारे प्रयास इस धरा को रहने योग्य बनाने तथा बेहतर जीवन की तलाश की तरफ केन्द्रित हैं। लेकिन जब तक बीमारी, गरीबी, गंदगी तथा भूख, जो मूलभूत समस्याएं हैं, उनका हल न होगा तब तक मानव जीवन न सार्थक होगा, न ही सभ्य। हम चहुं ओर जब देखते हैं तो पाते हैं कि विज्ञान तथा उन्नत टैक्नोलोजी हमारा जीवन सुखद, सुविधामय तथा सम्पन्न बनाने में प्रयासरत है, पर क्या सभ्यता के विकास के सोपान चढ़ते हुए हम देख पा रहे हैं कि क्या विश्व से बीमारी, गरीबी, गंदगी तथा भूख को मिटा पा रहे हैं या हम एक शोषण व अन्याय केन्द्रित व्यवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं। शारीरिक दु:खों, मानसिक रोगों तथा मानवनिर्मित अभावों से आज हम जितना जूझ रहे हैं, शायद पहले ऐसा नहीं था। देश में पहली बार अस्पताल में टूटते रिश्तों का इलाज करने का प्रावधान होने जा रहा है। इंस्टिच्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलायड साइंसिज द्वारा सीआईयू अर्थात क्राइसिस इंटरवेंशन यूनिट खोली जाएगी, जो सास-बहू, पति-पत्नी, भाई-भाई, मां-बेटा इत्यादि टूटते रिश्तों को जोडऩे व पुन: सशक्त बनाने की कोशिश करेगी। मनोवैज्ञानिक व सामाजिक मदद देकर खराब रिश्तों को ठीक करने का प्रयास इस प्रोजैक्ट का मुख्य उद्देश्य है। साइकैट्रिक यूनिट के साथ मिलकर यह क्राइसिस यूनिट कार्य करेगा, लेकिन दोनों का कार्यक्षेत्र अलग है। ऐसे लोग, जो मानसिक रूप से बीमार नहीं हैं लेकिन उन्हें भावनात्मक रूप से मदद की जरूरत है, के लिए यह यूनिट कार्य करेगी तथा इसे तीन महीने के लिए ट्रायल के तौर पर चलाया जाएगा। सामाजिक तथा पारिवारिक तानाबाना आज इस तरह से बिखर रहा है कि सकारात्मक कदम तो हम सामूहिक तौर पर उठाते ही नहीं, नकारात्मक कदम जरूर समूहों द्वारा उठाए जा रहे हैं। जैसे कि दिल्ली में बुराड़ी इलाके के परिवार के 11 सदस्यों द्वारा इकट्ठे आत्महत्या करना या फिर भीड़तंत्र जो कि उत्तेजक तथा हिंसक रूप लेता जा रहा है, उसका उदय इसके उदाहरण हैं। सोशल मीडिया का भस्मासुर भी सामाजिक एकता व समरसता को लील रहा है तथा आपसी मेलजोल व विचार-विमर्श को नेगेटिव ज्यादा कर रहा है। इसके बढ़ते वर्चस्व से सभी भयभीत हैं। यही कारण है कि ध्यान तथा शक्ति मूलभूत समस्याओं तथा उलझनों की तरफ ज्यादा दिया जा रहा है। मानव अर्श की तरफ जा रहा है, पर मानवता फर्श की तरफ जा रही है। हम तथा हमारा समाज चाहे वैयक्तिक स्तर पर या वैश्विक स्तर पर, दो विपरीत दिशाओं में अग्रसर हो रहे हैं। मानव सभ्यता का विकास एक तरफ नए कीर्तिमान बना रहा है, जबकि सारे मानवीय प्रयास चाहे वह राजनैतिक हो या सामाजिक व सांस्कृतिक, सबको उद्देश्य ‘सर्व भूत हिताय: सर्व भूत सुखाय:’ की ओर होना चाहिए। वहीं इसके पतन के भी उदाहरण देखे जा सकते हैं। हाल ही में एक खबर पढ़ी, जिसने चौंका दिया कि एक दम्पत्ति जो फुटबॉल प्रेमी थे। पिछले वल्र्ड कप में फुटबॉल मैदान में ही उनका मिलन हुआ जो विवाह का कारण बना तथा दोनों में सम्बन्ध विच्छेद हुआ, जो कि तलाक तक पहुंचा, जिसके पीछे कारण महज इतना ही था कि पति-पत्नी में से एक रोनाल्डो का फैन था तो दूसरा मैसी का। एक-दूसरे के हीरो की आलोचना उनके बीच उत्तेजना का कारण बनी और दोनों अलग हो गए। ऐसे खबर पढक़र श्री लाल की पंक्तियां याद आती हैं, ‘‘बेवकूफ लोग, बेवकूफ बनाने के लिए, बेवकूफों की मदद से, बेवकूफों के खिलाफ, बेवकूफी करते हैं।’’ हम किस बेवकूफियत या समझदारी की तरफ बढ़ रहे हैं, इसका आज अंदाजा लगाना कठिन है। पर आने वाले दौर में विश्वास, मूल्य, सभ्य आचरण सब ढूंढते रह जाएंगे। (डॉ० क० ‘कली’)
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