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फुटबाल-शुटबाल - हाय रब्बा या वाह फुटबाल वाह

June 27, 2018 09:09 PM

फीफा वर्ल्ड कप के चलते, गली कूचे सब जगह फुटबाल छाई हुई है। हर चौथे वर्ष के इस वैश्विक कुम्भ का अपना अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र व राजनीति शास्त्र हैं। एक जमाने में कहा जाता था कि विकासशील राष्ट्रों जैसे भारत, बांग्लादेश, श्री लंका, पाकिस्तान में क्रिकेट के लिए जनून है, वहीं विकसित राष्ट्रों में फुटबाल का जनून है, माना कि खेल भी राष्ट्रों के विकास के स्तर को वर्गीकृत तथा परिभाषित करते हैं। भारत में फुटबाल कितना खेला जाता है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 125 करोड़ के देश में विश्व स्तर की खेलने वाली एक भी टीम इस प्रतियोगिता में स्थान नहीं बना पाई, लेकिन खेल देखने वालों में, रूस में जाकर टिकटें खरीद कर मोटी रक्म खर्च करने वालों में, भारतीय आगे आये हैं। फीफा में हमारी टीम की रैंकिंग 97वें स्थान पर है, पर वर्ल्ड कप में खर्च करने तथा मैंच देखने वालों में, भारत का स्थान पहले दस देशों में शुमार है। अर्थात हम वास्तव में खिलाड़ी न होकर फैंस पर बैठकर ताली बजाने वालों में सबसे आगे हैं। दूसरे शब्दों में अर्थशास्त्र की दृष्टि से खिलाड़ी अगर उत्पादक माना जाए, क्योंकि वे कुछ सृजन कर रहा है, उपयोगिता तथा आय पैदा कर रहा है, तो वहां भारत हमारा देश जीरो हासिल कर रहा है, क्योंकि अनुमान लगाने वाले बताते हैं कि निरंतर प्रगति भी करे तो भी, फीफा 2022 (कतर) तथा फीफा 2026 में भारतीय टीम शायद ही अपना स्थान बना पाये। हां, मैच देखने वाले पैसे खर्च कर फीफा का आनंद लेने वाले उपभोक्ता के तौर पर हमारा देश अग्रणी रहने ही वाला है।

फुटबाल का अपना अर्थशास्त्र है, साइमन कूपर और स्टेफन की किताब Soccernomics, वर्ल्ड के बेस्ट सैलरस में शामिल है। इस में खेल में आर्थिक तथ्यों का विश्लेषण करते हुए ये बताया गया है कि क्यों स्पेन, जर्मनी था ब्राजील वगैरह मैच जीतेंगे, पर यूएसए, जापान, आस्ट्रेलिया इत्यादि इस वैश्विक खेल के राजा बनेंगे। भारत की इस खेल में उपभोक्ता के रूप में उपस्थिति तथा उत्पादकता के रूप में अनुपस्थिति हमारे देश की आर्थिक स्थिति तथा आर्थिक गतिविधियों पर भी प्रकाश डालती है। इस खेल को खेलने के लिए जो जानलेवा,  प्राणफूंक जज्बा  चाहिए वह हमारे में नहीं है। दूसरा देश में धन वितरण की विषमता अर्थात जो खेलने की क्षमता रखते हैं, उनके पास साधन नहीं हैं, जिनके पास साधन-सुविधाएं हैं वे फीफा विश्वकप देखने व ताली बजाने जाते हैं। यह शाश्वत सत्य, केवल फुटबाल  के खेल तक ही सीमित नहीं है, जीवन के बाकी क्षेत्रों में भी चाहे वह व्यापार हो, व्यवसाय हो, टेक्नोलोजी हो, उत्पादक के तौर पर हम पिछड़े हुए हैं। ज्यादा से ज्यादा वैश्विक दृष्टि से मध्यम स्तर तक पहुंचे हैं, वर्ल्ड क्लास जो पूरे विश्व में श्रेष्ठता का दावा कर सके, ऐसा न तो कोई उत्पाद बनाते हैं, न नवप्रवर्तन करते हैं। नोबल पुरस्कार हो या ओलिम्पिक्स या फीफा वर्ल्डकप या आस्कर अवार्ड सब में पीछे की पंक्ति में बैठना लगभग तय ही है। कहते हैं कि अर्थशास्त्री Produce करते हैं, जबकि राजनेता Consume करते हैं, हमारे देश में राजनीति खून में है, शायद इसीलिए हम उपभोक्ता के रूप में विश्व में सबसे आगे हैं।

विश्व की बड़ी-बड़ी कम्पनियां भी शायद हमें मंडी या हमारी बढ़ती मांग को देख, अपना सामान बेचने को भावी आकर्षक बाजार के रूप में देखती हैं। काश हमारा एक खाने वाला मुंह न देखकर कर्मठ भारतीय के दो हाथ भी देखती। अगर इन हाथों को कुशल व सशक्त बनाया जाए तथा उन्हें उत्पादक के तौर पर देखा जाए, तो भारत विश्व के हर क्षेत्र में अग्रणी बन सकता है। यह उत्पादकीय मनोवृत्ति तथा उत्पादक के रूप में सक्रिय रोल ही हमें आगे ले जा सकता है, अन्यथा उपभोग व पैसिव (निष्क्रिय) वृत्ति बनी रहे तो, हम पीछे ही रहेंगे। फिर वाह फुटबाल, वाह फुटबाल न होकर फुटबाल-शुटबाल - हाय रब्बा बनी रहेगी।

डा० क कली

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