Tuesday, September 25, 2018
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बढ़ती विकास दर - क्या वास्तव में सम्पन्नता की ओर ले जा रही है?

June 26, 2018 05:13 PM
आज के अर्थप्रधान युग में जीवन की गतिविधियों का केन्द्र धन कमाना, धन खर्च करना, धन का वितरण, धन का संचय तथा धन को बढ़ाना ही मुख्य हो गया है। इसलिए आर्थिक विकास ही विकास का पर्याय बन गया है। यह इस मान्यता पर आधारित है कि धन से सब सुख-सुविधाओं को बटोरा जा सकता है तथा आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। यही बात व्यष्टि स्तर पर तथा समष्टि स्तर पर राष्ट्रों का दृष्टिकोण सही प्रतीत होता है। लेकिन जिस आर्थिक विकास को बढ़ाने के लिए सभी प्रयत्नरत हैं तथा आए दिन आंकड़ों से सिद्ध किया जाता है कि अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है। आर्थिक विकास दर दहाई के आंकड़े को छूने वाली है। क्या वास्तव में हम आर्थिक सम्पन्नता की तरफ बढ़ भी रहे हैं या नहीं? उस आर्थिक विकास के मायने ही क्या हैं? जिससे रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते? धन की असमानता इतनी बढ़ रही है कि समाज वर्ग संघर्ष की तरफ बढ़ता जा रहा है। कीमतों में इतना उछाल आ रहा है कि आम व्यक्ति को अपना बजट संतुलित करने में दिक्कतें आ रही हैं। प्राकृतिक साधनों को न केवल प्रदूषित कर रहे हैं, अपितु उनका विदोहन इस हद तक हो रहा है कि आने वाले समय में वे बचेंगे ही नहीं। मध्यम वर्ग हाशिये की तरफ जा रहा है, क्योंकि कुछ-एक बहुत अमीर हो रहे हैं। जैसे कि भारत में 73 प्रतिशत धन एक प्रतिशत लोगों के हाथों में केन्द्रित हो गया है तथा बाकी तबका अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्ष कर रहा है। आर्थिक विकास के जो मॉडल हमने बनाए अथवा जिन आर्थिक नीतियों को लागू किया जा रहा है, उनका उद्देश्य आर्थिक विकास की दर को तेज करना है, पर प्रश्न ओवरऑल विकास का है। क्या उपभोग का व मांग का निरंतर बढऩा ही विकास का आधार है। रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तो आय बढ़ेगी, निवेश बढ़ेगा, उपभोग बढ़ेगा, जीवन स्तर सुधरेगा, फलस्वरूप लोगों का कल्याण भी बढ़ेगा। पर जो विकास हम कर रहे हैं, उसे उपभोग केन्द्रित बना रहे हैं, जबकि केन्द्र बिंदू उत्पादन होना चाहिए। उत्पादकता तथा रोजगार विकास के दो फलक जब तक वृद्धि को नहीं पाएंगे, तब तक विकास का आम जनता के लिए कोई अर्थ नहीं है, महज आंकड़ों का मकडज़ाल कहा जा सकता है। मोदी सरकार के प्रमुख आर्थिक निर्णयों में विमुद्रीकरण तथा जीएसटी (गब्बर सिंह टैक्स), जिसे सरकार सफल तथा दूरगामी परिणाम वाला बता रही है कि इससे आर्थिक विकास बढ़ा है, लेकिन जनता इसको स्वीकार नहीं कर पा रही है, क्योंकि आर्थिक वृद्धि की दर चाहे बढ़ी है, पर न तो देश में रोजगार बढ़ रहा है, न आय के साधन। कीमतें तथा आर्थिक असमानता दोनों आकाश की तरफ मुंह किए निरंतर बढ़ती जा रही है। आर्थिक विकास को मापने के लिए केवल आर्थिक वृद्धि दर ही पर्याप्त नहीं है। राजनेताओं, समाजनेताओं, धर्मनेताओं सबका उद्देश्य आर्थिक विकास पर केन्द्रित हो गया है। अत: इसे पुन: विचारने की जरूरत है कि क्या बढ़ती आर्थिक विकास की गति वास्तव में विकास तथा उत्थान की तरफ ले जा रही है या नहीं। विश्व में व्यापार युद्ध बढ़ते वैश्वीकरण के रथ को रोकने तथा राष्ट्रों को अपने को संकुचित तथा सिमटने की प्रक्रिया जारी हो चुकी है। एलपीजी- उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण की बयार ने आर्थिक विकास के मायने बदल डाले हैं। अर्थशास्त्रियों को विकास के मापने के लिए आर्थिक वृद्धि दर के अलावा नए मापदण्ड खोजने होंगे, जो सही मायने में विकास को इंगित करे। नए मॉडल, नए दृष्टिकोण तथा नई सोच की जितनी आवश्यकता आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी। टैक्नोलोजी ने अर्थव्यवस्थाओं का स्वरूप ही बदल दिया है। संरचना व साधन बदल चुके हैं। अत: नए आर्थिक मापदण्ड ईजाद करने होंगे। केवल मांग व पूर्ति के मॉडल आज चलन से बाहर हो गए हैं। अत: नए विचार, नई परिभाषाएं तथा नए फॉरमूले रचने होंगे, जिससे इस धरा से गरीबी, भुखमरी तथा बेरोजगारी से मुक्ति पाई जा सके तथा सब विकास को पाते हुए सुखी तथा संतुष्ट बनें। (डॉ० क० ‘कली’)
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