Tuesday, March 26, 2019
Follow us on
National

साधु-संतों का बदलता स्वरूप

June 20, 2018 06:44 PM
अगले वर्ष देश में दो महाकुम्भों का आयोजन होगा। एक चुनावी कुम्भ तथा दूसरा प्रयाग-इलाहाबाद में संतों-साधुओं का महाकुम्भ। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, जोकि देश में 13 प्रमुख अखाड़ों की शीर्ष संस्था है, ने एक बयान जारी करके कहा है कि संस्था गृहस्थ जीवन अपनाने के साथ-साथ अध्यात्म-धर्म के क्षेत्र में कार्य करने वालों को संत का दर्जा नहीं देती। अपने को राष्ट्रीय संत, सद्गुरू, विश्वगुरू, जगत गुरू नाना प्रकार की उपाधियों से सुसज्जित धार्मिक नेताओं की बाढ़ देश में आयी हुई है। मीडिया का प्रयोग करके आस्था, संस्कार, जागरण, सत्संग जैसे धर्म तथा अध्यात्म के चैनलों में कथावाचकों, उपदेशकों और प्रवचनकर्ताओं के लिए संत-महात्मा शब्द का चलन बढ़ा है। इसके साथ ही इधर धार्मिक नेताओं का राजनीति में वर्चस्व भी बढ़ा है, जिससे धर्म और राजनीति का घालमेल होने से विकास का मुद्दा पीछे छूटता दिखाई देता है। तथाकथित संतों के घपलों, फरेब तथा हिंसा में लिप्त होना इत्यादि ने संत शब्द को धूमिल किया है तथा लोगों की धार्मिक आस्था को गहरी चोट पहुंचाई है। ताजा मामला भय्यु जी महाराज का है, जिन्हें राष्ट्रीय संत माना जाता था तथा वे इससे सम्बोधित होते थे, उनके द्वारा किया गया आत्मघात तथा उनकी जीवनशैली- उनके संतत्व पर प्रश्नचिह्न लगाती है। शायद इसी संदर्भ में शीर्षस्थ संस्था ने गृहस्थी साधु-संतों को संत व साधु नहीं मानने का बयान जारी किया है। इस परिप्रेक्ष्य में यह जानना जरूरी है कि हमारे देश भारत, जोकि विश्वगुरू बनने का सपना संजोए हुए है, उस देश में गृहस्थी जीवन या विवाह संस्था को प्रत्यक्ष रूप से कहीं नकारा नहीं गया है। महात्मा बुध, जोकि राजकुमार थे, ने विवाह किया, महावीर स्वामी राजकुमार थे, ने विवाह किया पर उन्होंने मुक्ति के लिए राज व घर परिवार का त्याग किया। ऋषि-मुनियों ने भी धर्म व अध्यात्म संवर्धन का कार्य किया तथा विवाह कर गृहस्थ जीवन भी व्यतीत किया। कबीर, नानक, तुलसी सब संत भी थे तथा गृहस्थी भी थे। पर अब यह स्वस्थ परम्परा समाप्त होती दिखाई देती है। मोहनदास कर्मचंद गांधी को महात्मा की उपाधि गुरूदेव रवींद्र नाथ टैगोर ने दी थी। आज सब महात्मा गांधी को जानते हैं, मोहनदास को नहीं, क्योंकि वे राजनीति को साधन तथा धर्म को साध्य मानते थे। उनके लिए धर्म पहले था, राजनीति बाद में। पर आज राजनैतिक सत्ता पहले है, धर्म पीछे छूट गया है। इसीलिए शायद अखाड़ा परिषद ने संतों के पक्ष में सफाई देने के लिए यह बयान जारी किया है कि यह संस्था गृहस्थी व विवाहितों को संतों का दर्जा नहीं देती। पर संतों तथा धार्मिक नेताओं के सार्वजनिक जीवन में जो गिरावट आई है। जिस तरह से उनके चरित्र व चलन का भंडाफोड़ निरंतर हो रहा है, उससे लगता है कि इस क्षेत्र का नासूर गहरा है। रावण ने केवल एक बार सीताहरण के लिए साधु का भेष धारण किया। पर व्यवहारिक जगत में तो ऐसा पग-पग पर देखा जा सकता है। अत: सावधान रहने की जरूरत है। भोलीभाली जनता इन बाबा-साधु-संतों के चक्कर में आती रही है, गृहस्थी लोगों को गृहस्थी संतों या दूसरे साधु-संतों को चरित्र व धर्म आचरण की कसौटी पर कसकर ही उनका अनुकरण करना चाहिए। भेड़चाल व अंधविश्वासी बनकर उनका पिछलग्गू नहीं बनना चाहिए। (डॉ० क० ‘कली’)
 
Have something to say? Post your comment
 
More National News
Three Tata Brands among Top 20 of ‘India’s Most Consumer-Focused Brands’ list, Samsung leads list for Consumer Electronics: TRA Research मैं गरीबों को इज्जत दिलवाना चाहता हूं: राहुल गांधी 25 करोड़ लोगों को न्यूनतम आय योजना का लाभ मिलेगा: राहुल गांधी कांग्रेस नेता राशिद अल्वी का चुनाव लड़ने से इनकार, पार्टी को दिया सेहत का हवाला मुंबई: दाऊद के पूर्व सहयोगी शकील शेख का जसलोक अस्पताल में निधन पूर्व सांसद जया प्रदा हो सकती हैं बीजेपी में शामिल 91 सीटों पर पहले दौर के मतदान के लिए नामांकन का आज आखिरी दिन 27 मार्च को कैफियत एक्सप्रेस से अयोध्या पहुंचेंगी प्रियंका गांधी वाड्रा महाराष्ट्र: मुम्बई में पूर्व एनसीपी कॉर्पोरेटर पांडुरंग गायकवाड़ की हत्या Bar use of ‘mental’ & ‘mad’ jibe: Psychiatry body to EC