Sunday, October 21, 2018
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स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य और यथार्थ स्थिति के बीच डोलता भारत

June 04, 2018 06:10 PM
स्वतंत्रता के बाद सात दशकों के दौरान देश में सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्थिति में अत्यधिक सुधार होना चाहिए था, लेकिन इतने वर्षों के बाद भी हम वह सब हासिल नहीं कर पाए। संविधान निर्माताओं ने जो आदर्श रखे, उनको जीवन में न उतार पाए हैं तथा न ही उन्हें हम जी रहे हैं। परम्पराएं जो कुरीतियों की हद तक जीवन में पैठ बना चुकी थी, उनको हटाना चाहिए था तथा प्रजातंत्र के लिए आवश्यक विवेक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा आपसी समझ, जो पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए, उसका हमारे सार्वजनिक जीवन में अभाव रहा है। परिणामस्वरूप, आज हम उस चौराहे पर खड़े हैं, जहां हमने जीवन से परम्पराओं को तिलांजली दे दी है। उसके स्थान पर जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा तटस्था होनी चाहिए थी, वह अर्जित तथा निर्माण नहीं कर पाए हैं। उदाहरण के तौर पर, जाति प्रथा के बंधन सामाजिक जीवन में ढीले हुए हैं, पर जातिगत पहचान, राजनैतिक स्तर पर और भी अधिक बलवती हुई है। कोई भी चुनाव देख लीजिए, सबसे प्रमुख जातिगत समीकरण को ध्यान में रखा जाता है। यह जाट प्रधान इलाका है, यहां पंजाबी वोटर्स ज्यादा हैं, यहां बनिया बहुमत में हैं, यहां यादवों का आधिपात्य हैं, इत्यादि, इत्यादि। इसी प्रकार, धर्म-निरपेक्षता का मुद्दा ले लीजिए, यथार्थ के जीवन में हम हिंदू धर्म को जी रहे हैं या नहीं, सच्चे मुसलमान हैं या नहीं, पर राजनीतिक दृष्टि से, भारत-पाकिस्तान बनने के बावजूद भी, विभाजन की त्रासदी झेलने के बाद भी, राजनेता धर्म का यह मुद्दा सार्वजनिक जीवन में आज भी ज्वलंत रखे हुए हैं। जो तथ्य व्यक्तिगत जीवन में महत्व रखने चाहिए, उन्हें हम सार्वजनिक जीवन में महत्व दे रहे हैं तथा जो सार्वजनिक जीवन में महत्व का है, उसे हम निजी जीवन में उतार रहे हैं। धर्म और जाति बंधन या धर्म और जाति की पहचान, समय के साथ और भी सुदृढ़ हुई है। जबकि होना चाहिए था कि स्वस्थ परम्पराएं जीवन में बनाए रखते, क्योंकि परम्पराएं जीवन में आवश्यक अनुशासन लाती है तथा जीवन रूपी वृक्ष की जड़ें गहरा करती है तथा जीवन को अर्थ देती है। वहीं जीवन में आधुनिकता का समावेश भी जरूरी है, लेकिन उसके लिए जो वैज्ञानिक सोच तथा विवेक आधारित दृष्टिकोण जरूरी था, उसको जीवन में लाया जाना चाहिए था। शिक्षा के प्रसार द्वारा यह दोनों साथ-साथ बढ़ाने चाहिए थे, लेकिन न हम धर्म और जाति के बंधनों को काट पाए हैं और न ही आधुनिकता के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण ला पाए हैं। राजनेता इस दुधारी तलवार से सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में लगे हैं। न ही समानता और न ही स्वतंत्रता के आदर्श जमीनी हकीकत में आम व्यक्ति को उपलब्ध करवा पाए हैं। साथ ही जाति और धर्म के बंधन और कड़े हो रहे हैं। विकास और प्रगति के मायने बदल डाले हैं। जीवन में तथ्यपरक शोध और वैज्ञानिक आग्रह लगभग समाप्त हो गए हैं। आदर्शों के नाम पर ठेलमठेल अर्थात समझौते हो रहे हैं तथा परम्पराओं को सिर्फ ढोहा जा रहा है। माना कि संक्रमण काल में ऐसा ही होता है, पर यक्ष प्रश्न यह है कि हम किधर जा रहे हैं। आगे जा रहे हैं या पीछे लौट रहे हैं। परिवर्तन की गति से ज्यादा महत्वपूर्ण गति की दिशा होती है। न हम इधर के रहे न उधर के रहे, आधुनिकता और परम्परा सही मायने में जीवन से खारिज हो गई है। अंत में, ‘‘हम क्या थे? क्या हैं? क्या होंगे? अभी, आओ बैठें, विचार करें, ये समस्याएं सभी।’’ कवि की यह पुकार जितनी स्वतंत्रता प्राप्ति के समय अर्थपूर्ण थी, आज भी उतनी ही गम्भीर बनी हुई है। (डॉ० क० ‘कली’)
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