Sunday, October 21, 2018
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बढ़ते सम्पर्क के चलते हम कितने दूर-कितने नजदीक

May 31, 2018 05:56 PM
मनुष्य सामाजिक प्राणी है, समूह में रहता है। परिवार, समाज, प्रांत, राज्य, देश व विश्व, सब उसकी सामाजिकता की देन हैं। लेकिन आज जिस युग में हम रह रहे हैं, उसमें हम जुड़े तो सबसे हुए हैं, पर परस्पर सम्बन्ध कितने हैं, ये देखने और सोचने वाली बात है। हम आपस में निरंतर सम्पर्क में हैं, स्थान और समय की दूरी पर टैक्नोलोजी ने विजय प्राप्त कर ली है। पर एक परिवार में ही देख लो, सम्पर्क तो हैं, सम्बन्ध नहीं हैं। बातें तो बहुत कर रहे हैं, पर सार्थक संवाद कितना है, यह विचारणीय है। किसी भी क्षेत्र में चाहे वह आर्थिक, व्यावसायिक, सामाजिक या राजनैतिक सब में सूचनाओं के आदान-प्रदान का विस्फोट हुआ है, पर आपसी मेलजोल तथा सम्बन्धों की गुणवत्ता में गिरावट ही आयी है। कहने को सारा जहान अपना है, पर एक अदद दोस्त की तलाश जारी है। फेसबुक, वाट्सैप के जरिये हम सदैव निरंतर एक-दूसरे से सम्पर्क में तो हैं, इन आपसी रिश्तों में कितनी जान है तथा मनुष्य की मेलजोल की स्वाभाविक आवश्यकता को कितना पूरा करते हैं, यह छानबीन का विषय है। आज रिश्ते, चाहे वे खून के हैं या टैक्नोलोजी द्वारा उत्पन्न आपसी सम्बन्ध, सब सतही तथा खोखले हो गए हैं। पाश्चात्य संस्कृति में व्यक्तिगत इकाई को ज्यादा महत्व दिया जाता है, जबकि प्राचीन संस्कृति में समूह को। भारतीय तो वैसे भी प्रसिद्ध हैं कि जहां भी बैठेगें, बतियाएंगे, तुरंत सम्बन्ध बनाएंगे, सामाजिकता की यह प्रवृत्ति रेलयात्रा के दौरान देखी व समझी जा सकती है। पर अब बातचीत व संवाद केवल औपचारिक रह गए हैं। निजता की मांग, प्राइवेसी का मुद्दा केवल राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, घरों में भी ज्वलंत बन चुका है। घर में भी अपने लिए स्पेस, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, अपनी बात को अपने तक ही सीमित रखना, उसे शेयर ही न करना, इसकी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। सु:ख-दु:ख के भावों को खुले मन से, एक-दूसरे से बांटने में हम कतराने लगे हैं। आपस में विश्वास, एक-दूसरे के प्रति सम्मान तथा मानवीयता का सूत्र जो बंधा हुआ है, में ढीलापन आ गया है। हम इतने संकीर्ण तथा संकुचित होते जा रहे हैं कि विश्व मानव की कल्पना हमें थोपी प्रतीत होती है, जबकि कोई भी सार्थक संवाद व सम्बन्ध हमेशा दूसरे पक्ष की उपस्थिति से उत्पन्न होता है।यही कारण है कि प्रजातंत्र की महत्वपूर्ण संस्थाएं लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा सब में शोरगुल, हंगामा व निरर्थकता की हद तक विचार-बोल-व्यवहार का केन्द्र बन गयी है। मोदी जी की मन की बात एक तरफीय संवाद का सटीक उदाहरण है, जिसमें वो दिखाई तो देता है कि पूरे राष्ट्र के हित की चिंता में, पूरे देश से बात कर रहे हैं, पर वास्तव में यह संवादन केवल अपने लिए व पार्टी के लिए कर रहे होते हैं। जीवन में जीवंतता सम्बन्ध व सम्पर्क से जुड़ी होती है। शायद इसलिए दण्ड की व्यवस्था में जेल में बंद करना, उसके सम्बन्ध व सम्पर्क को काट देना, मानव के लिए दुखदायी होता है। पर अब में स्वयं के लिए स्वयं कारावासों का निर्माण कर रहे हैं। कहते हैं व्यक्तियों में प्रेम तथा वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए, लेकिन हम उल्टा करते हैं। व्यक्तियों का उपयोग तथा वस्तुओं से प्रेम करते हैं। यहीं जीवन में अभिशाप सिद्ध हो रहा है। आज की प्रवृत्ति ‘‘एक गुलाब मेरा बगीचा हो सकता है और एक व्यक्ति मेरी दुनिया’’ बढ़ते संचार व सम्पर्क की दुनिया में भौतिक दूरी तो कम हो गई है। हम नजदीक आ गए हैं, पर दिल हमारे दूर हो गए हैं, भावनाओं से रोते हो गए हैं। अंत में- हमारे परस्पर संवाद का एक उदाहरण ‘‘न उसे मेरे हाल का ख्याल है, न मुझे उसके हाल का ख्याल है। पर जब भी मिलते हैं, एक ही सवाल है। अरे भाई क्या हाल है? क्या हाल है?’’ (डॉ० क० ‘कली’)
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