Saturday, August 18, 2018
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National

पैट्रोल-डीजल की कीमतें और जीएसटी

May 29, 2018 05:49 PM
पिछले पखवाड़े में प्रतिदिन डीजल, पैट्रोल तथा सम्बन्धित पदार्थों में लगातार हो रही वृद्धि चिंता का विषय बनी हुई है। क्योंकि पैट्रोल तथा डीजल अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्र कृषि, उद्योग, व्यापार, वाणिज्य, ट्रांसपोर्ट से जुड़े हैं, उन पर इसकी कीमतों का उध्र्वगामी प्रभाव पड़ता है। अंतत: उपभोक्ता पर इसका प्रभाव कई गुणा जाकर पड़ता है। केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों पर छोड़ दिया है कि यदि वे चाहें तो कर घटाकर इसकी कीमतों को कम किया जा सकता है। दूसरी तरफ, पैट्रो पदार्थों को जीएसटी के अंतर्गत लाने की कवायद भी जारी है। इस क्षेत्र में कार्यरत सार्वजनिक वित्त विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन पर जीएसटी लागू किया जाता है तो उपभोक्ता को कोई खास फायदा नहीं होगा, क्योंकि सैस लगाने की व्यवस्था केन्द्र सरकार के पास है और प्रजातंत्र व्यवस्था करने के लिए केन्द्र सरकार इसे लगा सकती है। ‘एक राष्ट्र-एक कर’ पर आधारित जीएसटी भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में व्यवहारिक हो, मुश्किल है। भारत के संविधान में संघीय ढांचे की व्यवस्था है। केन्द्र जितना महत्त्वपूर्ण है, राज्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। वैसे भी महाद्वीप के आकार लिए विशालकाय तथा भारत देश में भिन्न-भिन्न प्रकार के छोटे-छोटे राज्यों की व्यवस्था की गई है ताकि शासन की दृष्टि से तथा विकास के दृष्टिकोण से सब को आगे अग्रसर होने के अवसर मिलें। पैट्रो पदार्थों पर अगर जीएसटी लागू होता है तो राज्य सरकारें, जिनकी वित्त व्यवस्था पहले से ही खस्ता है, अपने आय के साधन स्वयं न जुटा पाएगी तथा केन्द्र पर आर्थिक रूप से पूर्णत: निर्भर हो जाएगी। वे स्वतंत्र रूप से कोई कर न लगा सकेंगी तो आय कहां से आएगी तथा विधानसभा व विधानपालिका जैसी महंगी शासन व्यवस्था की जरूरत ही नहीं रह जाएगी क्योंकि सारी शक्तियां तो केन्द्र के पास होंगी, राज्य सरकारें मात्र कठपुतलियां बन जाएंगी, जैसे कि पहले से हो रहा है। इस तरह तो संविधान के संघीय ढांचे का प्रारूप खतरे में हो सकता है। पैट्रो पदार्थों पर अगर जीएसटी लगता है तो दूसरा यह भी कहा जा रहा है कि इस क्षेत्र में निजीकरण के चलते, कम्पनियां इनपुट क्रेडिट की मांग करेंगी, विशेषकर अम्बानी तथा अदानी ग्रुप को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है। हम क्रोनी कैपिटलिज्म की तरफ लगातार बढ़ रहे हैं, जहां पर लाभ तो निजी पूंजीपतियों को जा रहे हैं, हानियां पब्लिक को हस्तांतरित की जा रही हैं, कभी एनपीए के रूप में तो कभी कीमतें बढ़ाकर। राज्यों को विकास कार्यों तथा प्रशासन के लिए जिम्मेवारी अगर दी जाती है तो उसके अनुरूप कर एकत्र करने का अधिकार भी होना चाहिए। राज्य सरकारों के पास कुल करों का 40 प्रतिशत अधिकार है, जिसमें से 20 प्रतिशत एक्साइज से आता है तथा 20 प्रतिशत पैट्रो पदार्थों पर कर से आता है। यदि यह कर लगाने का अधिकार भी केन्द्र के पास चला जाता है तो राज्य सरकारों की आय बढ़ाने के लिए कोई स्रोत नहीं बचेंगे। (डॉ० क० ‘कली’)
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