Sunday, June 24, 2018
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चार वर्ष की उपलब्धियां - लोगों के जीवन स्तर में कितना सुधार

May 28, 2018 06:10 PM
निजी क्षेत्रों में कम्पनियां जैसे अपनी वार्षिक रिपोर्ट द्वारा अपने साल भर के लेखा-जोखा का मूल्यांकन कर बैलेंस शीट प्रस्तुत करती है, उसी का अनुसरण अब सरकारें भी कर रही हैं। जैसे कि एनडीए सरकार ने अपने चार साल पूरे होने पर अपनी उपलब्धियों को गिनवाया तथा सब अखबारों में पूरे-पूरे मुख्य पृष्ठ के विज्ञापन देकर अपने कार्यों का यशोगान किया। हम एक ऐसे दिखावे के युग में रह रहे हैं, जिसमें कार्य करना, जिम्मेवारियां पूरी करना, दायित्व निभाना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना उनको करने का शोर मचाना तथा लगातार उन उपलब्धियों के आंकड़ों की विंडो ड्रैसिंग करना। सरकारें अपनी हर सालगिरह पर नई योजनाओं की घोषणा तथा अपने सकारात्मक कदमों, जो कि उन्होंने उठाए हैं, की गिनती करवाती हैं। काश सरकारें यह अवसर अपने को सही मूल्यांकित करने, अपनी सम्पत्तियों के साथ-साथ अपने दायित्वों, कहां वे सफल तथा कहां वो असफल हुई हैं, का सही ब्यौरा देने के लिए बाधित होती। अब क्या हो रहा है? करदाताओं के पैसे का निर्दयतापूर्ण खर्च केवल नए नारे बनाने जैसे कि वर्तमान सरकार ने साफ नियत-सही विकास, गरीब जनता का कल्याण ही पहला कत्र्तव्य तथा बड़ी-बड़ी रैलियां करने में कर रही हैं। पैट्रोल तथा डीजल के भाव लगातार पूरे पखवाड़े से प्रतिदिन बढ़ाए जा रहे हैं, जिसका प्रभाव क्या अमीर, क्या गरीब सब पर पड़ता है। उसको कम करने की सरकार के पास गुंजाइश नहीं है, क्योंकि इससे वित्तीय घाटा और बढ़ जाएगा। पर कोई पूछने वाला होना चाहिए कि सरकार जो खर्च करती है, उसमें कितना उत्पादकीय तथा कितना अनुत्पादकीय है? सरकारें उपभोग पर इतना खर्च कर लेती हैं कि विकास कार्यों के लिए धन बचता ही नहीं। वित्त विभाग से जुड़े अधिकारियों की मानें तो सम्पन्न राज्यों में भी जितनी आय आती है, वह सब वेतन, रोजमर्रा के खर्चों में ही व्यय हो जाती है। विकास कार्यों के लिए जो धनराशि चाहिए होती है, उसे लोन या ऋण लेकर ही खर्च किया जाता है। अर्थात हम वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भविष्य को गिरवी रख रहे हैं। प्रधानमंत्री का यह दावा करना कि उनकी सरकार जनपथ नहीं जनमत से चल रही है, यह सरकार कन्फ्यूजन वाली नहीं, कमिटमेंट वाली है, इत्यादि जुमले क्या आम जनता के दु:ख-दर्द को कम कर सकते हैं? रोजगार परिदृश्य निराशाजनक हैं, स्वास्थ्य तथा शिक्षा स्तर पर गिरावट हो रही है। भ्रष्टाचार निरंतर बढ़ रहा है, महंगाई आकाश की तरफ छलांगे लगा रही है। हम मुतमुईन हैं कि हम तेजी से विकास कर रहे हैं, देश तरक्की कर रहा है। भाषणबाजी व विज्ञापन के इस युग में काम करो, न करो, फिर भी काम हो रहा है, इसका ढिंढौरा जरूर पीटा जाना चाहिए। आंकड़ों व तथ्यों को तोडऩा-मरोडऩा, अपने पक्ष को सुदृढ़ करने के लिए कुछ भी करना आम बात हो गई है। अपनी सस्ती लोकप्रियता तथा विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। चुनाव केंद्रित तथा सदा भविष्य पर आधारित शासन कार्यप्रणाली के लिए अब 2019 की चुनावी बिसात बिछ चुकी है, उसी के मद्देनजर ये सब तमाशा रचा जा रहा है। बीते चार सालों में आम आदमी- जनसाधारण के जीवन स्तर में कितना सुधार हुआ, प्रति व्यक्ति आय कितनी बढ़ी, रोजगार कितना बढ़ा, कानून एवं व्यवस्था में कितना सुधार हुआ, इन सब पर ठोस तथ्यपरक तथा विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध करवाए जाने चाहिए। पर आम आदमी के भरोसे तथा उसके सरोकारों की पैरवी, केवल जुमलों, नारों या विज्ञापनों से नहीं हो सकती। अंत में, गौतम राजऋषि के शब्दों में- ‘‘आसमां तक जा पहुंचा सैंसेक्स अपने देश का, चिथड़े हैं फिर भी बचपन के बदन पर, गौर कर। यार जब-जब घूम आते हैं विदेशों में, मगर अपनी तो बस कवायद घर से दफ्तर, गौर कर।’’ (डॉ० क० ‘कली’)
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