Sunday, June 24, 2018
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भारत के लोकतंत्र में एक ताजी बयार

May 25, 2018 06:43 PM

प्रजांतत्र केवल रूल बाय मेजोरिटी ही नहीं होता, परंतु प्रजातंत्र सही मायने में तभी कारगर होता है, जब उसकी संस्थाओं तथा व्यक्तियों में प्रजातांत्रिक प्रणाली का सम्मान हो। इस दृष्टि से विपक्ष का भी उतना ही महत्त्व होता है, जितना सत्ता पक्ष का। दक्षिण के राज्य कर्नाटक के चुनाव ने एक बार फिर खत्म होते विपक्ष में जान फूंक दी है। मोदी-शाह की भाजपा ने नारा तो कांग्रेस मुक्त भारत का दिया, पर वास्तव में हो यह रहा था कि देश में विपक्ष खत्म होता नजर आ रहा था। अब शपथ ग्रहण समारोह में विरोधियों ने मतभेदों को भुलाकर एक ही मंच पर एकजुट हुए। विपक्षी एकता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि शपथ ग्रहण समारोह में 17 दलों के सदस्य, जिनमें 145 सांसद थे, इक_ïे हुए। यह जमावड़ा नि:संदेह किसी सिद्धांत या विचारधारा से प्रेरित न होते हुए भी भानुमति के कुनबे से ज्यादा एकजुट लग रहा था। 2019 में होने वाले देश के चुनावी महाकुम्भ से पहले की यह एक झांकी दिखाई पड़ी, लेकिन प्रश्न यह है कि यह विपक्षी एकता क्या मोदी-शाह वाली सत्ताधारी भाजपा के समक्ष चुनौती प्रस्तुत कर पाएगी, टिक पाएगी या देश में बढ़ते ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा देगी। कार्ल माक्र्स के प्रसिद्ध वाक्य ‘‘इक_ïे हो जाओ, तुम्हें खोने को कुछ नहीं है, अगर कुछ खोओगे तो सिर्फ गुलामी की जंजीरें।’’ ‘‘तोड़ो कारा तोड़ो’’ से प्रेरित धूर विरोधी नेता एक-दूसरे से गलबहियां करते नजर आए। भारतीय राजनीति की तीन देवियां सोनिया, मायावती तथा ममता बनर्जी मंच पर न केवल इक_ïे दिखीं, उनके बीच अलग ही कैमिस्टरी दिखाई दी। राहुल गांधी, अखिलेश, सीताराम येचुरी तथा अजित सिंह यद्यपि सभी विभिन्न पार्टियों के अध्यक्ष होते हुए भी अपने मनमुटाव दूर कर न केवल इक_ïे दिखे, अपितु भारतीय राजनीति का एक नया अध्याय जोडऩे में सांझ की। जेपी के नेतृत्व में 1977 की जनता पार्टी आपातकाल के बाद कांग्रेस व इंदिरा गांधी के विरोध ने विपक्षी एकता पर प्रश्न चिह्नï लगाए। इस मिली-जुली व्यवस्था के पीछे अभी तो अस्तित्व का सवाल है। पर आने वाले समय में आपस में सहयोग तथा सहभागिता के सिद्धांत पर कितने खरे उतरते हैं, यह समय बताएगा। पर फिलहाल देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की बहाली तथा उनमें प्रतिबद्धता के लिए जो सशक्त विपक्ष होना चाहिए, उसकी तरफ एक कदम बढ़ाया गया है। हो सकता है, हमारे राजनेता धर्म और जाति की राजनीति छोडक़र युवा देश के युवाओं का भविष्य उज्ज्वल करने के लिए उसकी जरूरतें जैसे आर्थिक विकास, रोजगार, महंगाई पर एकमत हों तथा इसके लिए कार्य करें। सबका साथ-सबका विकास- सब सफल हों, एक मात्र नारा न रहकर, जिस भावना से ये विपक्ष एकत्रित हुआ है। आशा करते हैं एकमुठ रहेंगे तथा उदारता से कार्य करेंगे। जो यह प्रयोग कर्नाटक में किया गया है, उसको आने वाले चुनावों में भी किया जाना चाहिए। सत्ताधारी दल की निरंकुशता तथा मनमानी पर लगाम लगाने के लिए सशक्त तथा सक्षम विपक्ष की भूमिका के बिना डायनेमिक तथा जीवनोपयोग प्रजातंत्र सोचा भी नहीं जा सकता। हालांकि यह भी देखना है कि कर्नाटक की सरकार कितने दिन तथा कैसी चलती है? सत्ता समीकरण बदलते ही यह एकता खण्डित होती है या बनी रहती है, देखना बाकी है। कुछ भी हो, भारतीय राजनीति ने अंगड़ाई ली है तथा विविधता के चलते राजनैतिक घटनाक्रम रूचिपूर्ण हो गए हैं।

                                            (डॉ० क० ‘कली’)

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