Sunday, June 24, 2018
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Haryana

परीक्षा परिणामों का विश्लेषण चुनाव परिणामों की तरह क्यों नहीं?

May 22, 2018 06:31 PM

(डॉ० क० ‘कली’)

हरियाणा बोर्ड के 10वीं का परिणाम, हमेशा की तरह, शिक्षा की स्थिति पर, जिस तरह की शिक्षा हम अपने नौनिहालों को दे रहे हैं, उसके बारे में बहुत कुछ कहता है तथा पूरी तरह से निराशाजनक रहा।
आधे बच्चे तो परीक्षा पास ही नहीं कर पाए। सुखद तथा संतोषजनक तथ्य यह है कि गांवों के स्कूलों ने, शहरों के स्कूलों से अच्छा प्रदर्शन किया, ग्रामीण स्कूलों का परिणाम 52 प्रतिशत, जबकि शहरों में स्थित स्कूलों का पास प्रतिशत 50 प्रतिशत रहा। हमेशा की तरह लड़कियों ने लडक़ों को पछाड़ा (लड़कियों का पास प्रतिशत 55 प्रतिशत, लडक़ों का 47.61 प्रतिशत) एक ओर चौंका देने वाला तथ्य यह रहा कि स्वयंपाठी अर्थात ओपन स्कूल से अर्थात खुद पढक़र आए परीक्षार्थियों का परिणाम 66.72 प्रतिशत, जोकि स्कूली छात्रों से काफी ऊंचा है। गणित व विज्ञान जैसे मुश्किल विषयों में तो असफलता की दर हमेशा ही ज्यादा रहती है, पर हिंदी जैसे आसान, जो भाषा स्वयं बोलते हैं, उसमें भी 50,000 से ज्यादा विद्यार्थी असफल रहे। अंग्रेजी तो फिर विदेशी भाषा है, उसमें एक लाख से ज्यादा परीक्षार्थी अनुत्तीर्ण रहे। निजी स्कूलों का परिणाम (60 प्रतिशत) सरकारी स्कूलों (44 प्रतिशत) से बेहतर रहा।
भारत जैसे देश जहां हमारे पास केवल मानवीय संसाधनों की बहुलता हैख् जिनसे डेमोग्राफिक डिविडेंड की अक्सर बात की जाती है, अगर शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर सुधार न किया गया तो यही हमारे लिए बहुत बड़ी दायित्व बन जाएगी। कहना गलत न होगा कि शिक्षा के स्तर तथा गुणवत्ता सुधार के लिए क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे। शिक्षाविदें, अधिकारियों तथा बुद्धिजीवियों को इन परिणामों सम्बन्धी आंकड़ों का गहन विश्लेषण कर रचनात्मक सुझावों की शिक्षा नीति तथा उसके कार्यान्वयन में जरा देर नहीं लगानी चाहिए। शिक्षा सुधार जो पहले से लागू किए गए हैं, जैसे कि 9वीं कक्षा तक विद्यार्थियों को फेल न करना, ताकि ड्रॉपआऊट रेट कम किया जा सके, उनकी फिर से समीक्षा की जरूरत है। इसी तरह शिक्षा डिजिटलीकरण जो किया जा रहा है, जबकि स्थानीय स्तर पर न तो ढांचा न ही साधन, उसकी भी फिर से मूल्यांकन करने की जरूरत है। चुनावों के परिणामों का इतना गम्भीर तथा बाल की खाल उखाडऩे तक का मनन-चिंतन किया जाता है, क्यों न उतनी ही तन्मयता तथा उत्साह के साथ शिक्षा के परिणामों का अध्ययन, विश्लेषण और मूल्यांकन होना चाहिए ताकि शिक्षा को न केवल जीवन उपयोगी बनाया जा सके, अपितु कारगर तथा उत्पादकीय भी बनाया जा सके। प्रजातंत्र की सफलता तथा देश के विकास के लिए शिक्षित नागरिक अपरिहार्य है। परीक्षाओं के परिणाम, शिक्षा के स्तर तथा उससे जुड़ी समस्याओं पर बहुत कुछ कहते हैं, उनकी पदचाप सुनने की जरूरत है तथा उनमें सुधार कर आगे बढऩे की आवश्यकता है।

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