Tuesday, October 16, 2018
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Haryana

HARYANA-सरकार पर भाजपा संगठन हावी

March 12, 2018 06:50 AM

COURSTEY DAINIK  BHASKAR MARCH 12
सरकार पर भाजपा संगठन हावी

फर्स्ट न्यूज

भास्कर टीम | पानीपत/प्रदेश के विभिन्न जिलों से
भाजपा के कार्यकर्ता भले ही हर मीटिंग में उनकी सुनवाई नहीं होने का मुद्दा उठाते हों। लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। पिछले कुछ समय से प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर भाजपा का संगठन हावी होता जा रहा है। सरकार के नियुक्त एचसीएस और आईएएस अधिकारियों से भी ज्यादा महत्व भाजपा के कम पढ़े-लिखे पदाधिकारियों को दिया जा रहा है।
हरियाणा में भाजपा सरकार की शुरुआत में सीएम विंडो की स्थापना की गई थी। उस समय समाधान की सीधी जिम्मेदारी केवल संबंधित अधिकारी की होती थी। पिछले करीब एक साल से भाजपा ने हर विधानसभा अनुसार अपने सदस्यों की निगरानी कमेटी नियुक्त कर रखी है। अब संबंधित अधिकारी की जांच रिपोर्ट के बाद इस कमेटी के सदस्य के भी उसमें सहमति हस्ताक्षर होने जरूरी हैं। उसी के बाद जांच रिपोर्ट मान्य होती है और शिकायत का समाधान भी उसी स्थिति में माना जाता है। अब इसमें देखने में ये आ रहा है कि तमाम सदस्य अपनी मनमर्जी से शिकायतों का समाधान दिखा देते हैं। उधर, सुनवाई न होने से शिकायतकर्ताओं को चक्कर काटने के मजबूर होना पड़ता है। बेशक ये निगरानी कमेटियां लोगों की परेशानी कम करने के लिए बनाई गई थीं, लेकिन इससे परेशानी और भी ज्यादा बढ़ गई है। उधर, निगरानी कमेटी के सदस्यों का दावा है कि उनके पास हर महीने जितनी शिकायतें आती हैं, वो उनका सौ फीसदी समाधान करवाते हंै। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि शिकायतकर्ता एक ही शिकायत के समाधान के लिए उसे तीन से चार बार लगाने पड़ रहे हैं।
रिपोर्ट: राजेश खोखर, इनपुट: रेवाड़ी से अजय भाटिया, सिरसा से कुलदीप शर्मा, फतेहाबाद से संजय आहुजा, भिवानी से अशोक कौशिक, डबवाली से पूरण धनरेवा, कुरुक्षेत्र से संजीव राणा, जींद से संजय योगी, सोनीपत से जीतेंद्र बूरा, रोहतक से रत्न पंवार, यमुनानगर से कुलभूषण सैनी।
दैनिक भास्कररिसर्च स्टोरी
हर कमेटी में भाजपा पदाधिकारी शामिल, कार्यकर्ताओं में अपनी पैठ बनाने के लिए खुद कार्यालय में सजाते हैं दरबार
आईएएस अधिकारियों की जांच रिपोर्ट को फाइनल कर रहे कम पढ़े-लिखे पदाधिकारी
जानिए, कैसे काम करती है ये निगरानी कमेटी
सीएम विंडो पर जब भी कोई शिकायत आती है तो संबंधित अधिकारी उसकी जानकारी अपने क्षेत्र की निगरानी कमेटी के संयोजक को देता है। संयोजक इसमें किसी सदस्य की ड्यूटी लगता है। इसके बाद सदस्य अपने कार्यालय या घर पर संबंधित अधिकारी और शिकायतकर्ता को बुलाता है। जहां उनका समझौता करवाने के प्रयास होते हैं। शिकायत पर कार्रवाई के बाद संबंधित अधिकारी और शिकायतकर्ता के साइन करते हैं, लेकिन इसके बाद अंतिम लाइन निगरानी कमेटी का सदस्य लिखता है। यह सदस्य जो लिख देता है, वही सरकार में सर्वमान्य होता है।
जिम्मेदारी अधिकारी की और मान्यता सदस्य की
जिस दिन से इन निगरानी कमेटियों को नियुक्त किया गया है, तब से फाइनल मान्यता सदस्यों को दी जाती है। जिम्मेदारी फिर भी अधिकारियों की है। अगर किसी शिकायत का समाधान दिखा दिया और बाद में उच्च अधिकारियों की जांच में कोई गलती मिली, तो संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई होती है। लगातार ऐसे मामलों में अधिकारी सस्पैंड हो भी रहे हैं। जिस सदस्य को फाइनल मान्यता दी जाती है, उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
ये कैसा मजाक, रिपोर्ट फाइनल करने वाले सदस्य 5वीं पास
इन निगरानी कमेटियों के गठन के बाद एक रोचक तथ्य सामने आया है कि शिकायतों की जांच करने वाले अधिकारी एचसीएस और आईएएस होते हैं, लेकिन जिन सदस्यों की फाइनल रिपोर्ट होती है, वो कम पढ़े-लिखे हैं। ऐसा नहीं है कि सभी सदस्य कम पढ़े लिखे हैं, लेकिन ज्यादातर कम पढ़े लिखे हैं। प्रदेश में हर विधानसभा पर एक कमेटी बनाई गई है, जिसमें 8 से लेकर 15 तक सदस्य हैं और उनका एक संयोजक है। इनमें...
सीएम विंडो की शिकायतों के समाधान के लिए भाजपा ने हर विधानसभा अनुसार बनाई है निगरानी कमेटी
25%
ग्रेजुएट हैं
25%
आठवीं से बारहवीं पास
40%
पांचवी से आठवीं पास
10%
पांचवी पास
ग्राउंड रिपोर्ट: बिना शिकायतकर्ता को बुला दिखा रहे समाधान
शिकायत हल किए बिना ही समाधान
सिरसा जिले में निशान सिंह पुत्र अनूप सिंह निवासी करीवाला ने 1 अगस्त 2017 को शिकायत नंबर 090681 को करीवाला-तलवाड़ा-ऐलनाबाद लिंक रोड की शिकायत की थी। निगरानी सदस्यों ने बिना हल कराए ही शिकायत सही बता कर 29 सितंबर 2017 को फैसला भी दे दिया। कागजों में रोड भी बनवा दी और रास्ता भी चौड़ा करवा दिया। लेकिन इसके उलट हकीकत जमीनी हकीकत कुछ अलग ही थी। इससे नाराज होकर शिकायतकर्ता निशांत सिंह ने सीएम विंडो के सदस्यों के खिलाफ हरियाणा के मुख्य सचिव को 1 फरवरी 2018 पत्र लिख कर मामले की जांच कर कार्रवाई की मांग की।
शिकायतकर्ता पर ही एफआईआर की
डबवाली कालुअाना के पूर्व सरपंच जगदेव सहारण ने 2016 में सीएम विंडो में शिकायत दर्ज करा पंचायती रिकाॅर्ड पूरा कराने की मांग की। अधिकारियों ने शिकायत का निपटारा करने के एवज में उसी पर 409 की एफआईआर दर्ज कर दी। इसी केस में 13 सितंबर 2017 को पुलिस हिरासत में संदिग्धावस्था में जिप्सी से हाइवे पर गिरने से उनकी मौत हो गई। मामले में परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखा है, वहीं मानवाधिकार आयोग से जांच की मांग की।
सहयोग के लिए बनाई हैं कमेटी
भाजपा प्रदेश समिति के सदस्य और इन निगरानी कमेटियों के इंचार्ज के साथ सीएम के राजनीतिक सलाहकार दीपक मंगला का कहना है कि इन कमेटियों का सरकार के काम में कोई दखल नहीं है। इनको केवल सहयोग करने के लिए बनाया है। सभी की समय-समय पर मीटिंग ली जाती हैं और उन्हें कार्यप्रणाली बताई जाती है। सदस्य को केवल यह देखना होता है कि कोई अधिकारी शिकायतकर्ता को परेशान तो नहीं कर रहा है। अगर कोई सदस्य अपनी मनमानी कर रहा है। इस पद का दुरुपयोग कर रहा है, तो यह गलत है। इस तरह के मामलों की रिपोर्ट ली जाएगी।
जांच अधिकारी की फाइनल रिपोर्ट पर कमेटी सदस्य के साइन जरूरी, ज्यादा निपटारा दिखाने के लिए दिखा रहे झूठे समाधान
निगरानी के नाम पर पार्टी पदाधिकारियों को चमका रहे
इन सभी निगरानी कमेटी के सदस्यों की प्रदेश के सभी जिलों से दैनिक भास्कर ने ग्राउंड रिपोर्ट करवाई तो ये तथ्य सामने आया कि निगरानी की जिम्मेदारी देने के नाम पर पार्टी अपने पदाधिकारियों को चमकाने का काम कर रही है। इन सदस्यों में ज्यादातर भाजपा में बड़े पदों पर तैनात हैं। प्रदेश में पद रखने वालों से लेकर जिला अध्यक्षों तक को इसमें जिम्मेदारी दी गई है। ये सदस्य शिकायतों के समाधान के लिए अपने कार्यालयों, घरों और दुकानों में दरबार लगाते हैं, जिससे क्षेत्र में उनकी व्यक्तिगत पैठ बन सके।
डीजीपी के आदेश, फिर भी नहीं फैसला
गांव किरढान की सुनीता जमीनी विवाद में 12 साल से अफसरों के चक्कर लगा रही है। सीएम विंडो शुरू होने के बाद तीन बार जमीन पर कब्जा छुड़ाने व आरोपितों पर कार्रवाई की मांग कर चुकी है, पर कुछ नहीं हुआ। सुनीता ने बताया कि विंडो पर शिकायत करने के बाद एमीनेंट पर्सन ने पहले तो मेरी शिकायत को सही बताते हुए कार्रवाई की सिफारिश की, लेकिन डेढ़ महीने के बाद उसने दूसरी रिपोर्ट में लिखा दिया कि शिकायतकर्ता दबाव बनाने के लिए बार-बार शिकायत कर रही है। वहीं, डीजीपी इस मामले में एसपी को जांच के आदेश हो चुके हैं, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
दो बार शिकायत, बिना समाधान बंद की
रेवाड़ी में 17 जुलाई 2017 को सीएम विंडो पर शिकायतकर्ता विजयपाल ने शिकायत दर्ज कराई कि उसके गांव में बन रही सड़क में घटिया सामग्री का इस्तेमाल हुआ है। शिकायतकर्ता के पास पहले तो फोन आए, लेकिन 30 अगस्त को उसके बिना ही यह शिकायत फाइल कर समाधान दिखा दिया। विजय पाल ने दोबारा शिकायत लगाई तो भी इसी तरह बंद की गई। आखिर डीसी ने जांच विभाग के एक्सईएन को सौंपी।
निगरानी से मॉनिटरिंग व कार्रवाई
सीएम विंडो को लेकर सरकार और संगठन दोनों पूरा जोर लगा रहे हैं। एक तरफ सगठन की कमेटियां निगरानी कर रही हैं, तो दूसरी तरफ सरकार के अधिकारी इसकी मॉनिटरिंग करते हैं। पहले जिला स्तर पर मॉनिटरिंग होती है और इसके बाद सीएम के अतिरिक्त प्रधान सचिव राकेश गुप्ता इसकी लगातार मॉनिटरिंग करते हैं। हर मीटिंग में दो से चार अधिकारी शिकायत का समाधान नहीं करने पर सस्पैंड भी हो रहे हैं। इसके बावजूद शिकायतों का समाधान नहीं हो रहा और लोग चक्कर पर चक्कर काटने को मजबूर हो रहे हैं। सदस्य दावा करते हैं कि वे शिकायतों का समाधान करते हैं

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