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सुशासन एक चक्रव्यूह - इच्छाशक्ति चाहिए

February 20, 2017 04:42 PM

महाभारत के अभिमन्यू को चक्रव्यूह का शायद पूरा ज्ञान न हो पाया था। परंतु सुशासन चक्र का ज्ञान डा0 भीमराव अम्बेडकर ने हमे विस्तार से दिया है। तो सुशासन के इस चक्रव्यूह को तोड़ना मुश्किल क्यों है और इसके लिए जिम्मेवार कौन है ?भारतीय संसदीय प्रणाली एक विशिष्ट व विचित्र प्रणाली है। इसमें बड़ी ही सुंदर संसदीय प्रणाली दी हुई है। यह संविधान व संविधान के अनुच्छेद 118/208 के अंतर्गत विधानमडलों द्वारा बनाए गए नियमों में विस्तृत रूप से दिया गया है। इसका सारांश ही यहां पर प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रष्न उठता है कि यह प्रणाली कैसी है, सुशासन क्या है और सुशासन लाने में सक्षम कौन हैं।यहां यह जानना आवष्यक है कि सुशासन का संबंध लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों - विधानमंडल, कार्यपालिका व न्यायपालिका से है। हालांकि यह एक व्यापक विषय है परंतु यहां पर संसदीय प्रणाली में सुशासन से संबंधित दो स्तम्भों विधानमंडल व कार्यपालिका के बारे में ही बताना आवश्यक है क्योंकि न्यायपालिका का कार्य विधानमंडल व कार्यपालिका की कार्यशैली पर निर्भर करता है।भारतीय सदियों पुरानी संस्कृति के अतिरिक्त, सुशासन के बारे में बहुत से दार्शनिकों, संविधान विशेषज्ञों ने विश्लेषण किया है और अपनी धारना व्यक्त की हैं। महान दार्शनिक चाणक्य की नीति अनुसार राजा का कर्तव्य प्रजा की सेवा व उसका पालन पोषण होता है। जनता का सुख-दुख ही राजा का सुख-दुख होता है। इसी तरह फ्रांस के मशहूर दार्शनिक डेनिस डिडेराट ने 18वीं सदी में कहा था कि ‘‘आप अधिकार रखते हैं तो न्याय करना भी कर्तव्य है। सिर्फ एक कदम कट्टर को बर्बर बना सकता है।’’ महात्मा गांधी जी की भी यही धारण थी कि राजनीति जनता की सेवा के लिए होती है न कि उनका मास्टर बनने के लिए। संविधान निर्माता डा0 अम्बेडकर ने भी जनप्रतिनिधियों को शक्तियां व विशेष अधिकार देने का संविधान सभा में वर्ष 1949 में इसी कारण जोर दिया था कि सदस्य तभी जनता की सेवा बिना किसी रूकावट के कर सकते हैं जब उनके पास पूर्ण शक्ति व अधिकार होंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि जनप्रतिनिधि त्याग करने वाले हों। इसी कारण संविधान के अनुच्छेदों 105, 122, 194 व 212 आदि में सदस्य, सदन व विधानमंडलों को शक्तियां दी गई।अब यह जानना आवश्यक है कि सुशासन है क्या ? सुशासन का संबंध राज्य व्यवस्था की तीनों शाखाओं विधानमंडल, कार्यपालिका व न्यायपालिका से है। यही वो तथ्य है कि जो सुशासन को एक चक्रव्यूह की तरह दिखने को मजबूर करता है। कारण हमारे सामने हैं जिन्हें दर्षाने का प्रयत्न किया गया है।हमारे सभी राजनेता, सरकार यही आवाज उठाती रहती है कि भ्रष्टाचार खत्म करेंगे और सुशासन लाएंगे। जबकि यह मात्र अधूरा भ्रम है। सही है कि भ्रष्टाचार न हो, परंतु यह भी सही है कि अकेले भ्रष्टाचार (वह भी सिर्फ किसी विशेष स्तर तक) खत्म होने से सुशासन आ ही नहीं सकता। संविधान विशेषज्ञों विशेषकर डा0 सुभाष कश्यप द्वारा लिखित पुस्तक के अनुसारः- सुशासन उसे कहा जाता है कि राज्य व्यवस्था की तीनों शाखाऐं विधानमंडल, कार्यपालिका व न्यायपालिका में शक्तियों का सही इस्तेमाल किस तरीके से किया जाता है। अतः सुशासन की आवश्यकता जनहित में इन तीनों शाखाओं से संबंधित है।उपरोक्त अनुसार सुशासन चक्रव्यूह का भेदन करना विशेष रूप से दो शाखाओं विधानमंडल व कार्यपालिका पर ही निर्भर हैं, क्यों ? जनता जनप्रतिनिधि चुनती है, जनप्रतिनिधियों से विधानमंडल बनते हैं, विधानमंडलों से कार्यपालिका बनती हैं और कार्यपालिका प्रशासन से जनहित के कार्य, जनता की समस्याओं को दूर करना व उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना आदि करवाती है। अब प्रश्न उठता है कि सुशासन कैसे हो, यह बहुत ही आसान है, यदि हमारे जनप्रतिनिधियों की इच्छाशक्ति हो। क्योंकि जनप्रतिनिधि ही विधानमंडल व कार्यपालिका को नियंत्रित करते हैं और इनकी सत्ता भी उन्हीं के हाथों में होती है और ये ही उनका संचालन करते हैं।कार्यपालिका, विधानमंडल द्वारा कानून बनाकर पूरे वर्ष के लिए दिए गए जनधन का इस्तेमाल प्रषासन से जनहित के कार्यों पर करवाती है। प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण कार्यपालिका का होता है और सही काम की जिम्मेवारी भी कार्यपालिका की ही होती है, क्योंकि कार्यपालिका ही विधानमंडल के प्रति जवाबदेह भी है। जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 164 में दिया भी गया है। शायद इस बात को जनता समझ सके कि सुशासन रूपी चक्रव्यूह विधानमंडल व कार्यपालिका के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है और जनता इससे अनभिज्ञ होती है। जनप्रतिनिधि चुनने के बाद जनता का विश्वास उन्ही पर होकर रह जाता है परंतु जनप्रतिनिधि अपने संसदीय दायित्वों को किस तरह निभा रहे हैं इसकी तरफ न जनता का न किसी ओर का ध्यान जा पाता है। इतना ही नहीं यदि कार्यपालिका/ प्रशासन अपने कर्तव्यों में किसी प्रकार की कोई गलती करती है या कमी छोड़ती है तो विधानमंडल के सदस्य अपने सदन व सदन की समितियों के माध्यम से कार्यपालिका व प्रशासन से जवाब तलब करती है। विधानमंडल, कार्यपालिका पर दो तरह का नियंत्रण रखती है एक तो संवैधानिक/राजनीतिक (विधानमंडल के प्रति जवाबदेही) दूसरा राजकोष पर नियंत्रण। क्योंकि सदन के पास समय कम होता है इसलिए विधानमंडल अपने अधिकतर कार्य सदन की समितियों के माध्यम से पूरे वर्ष प्रशासन की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखती है। समितियों के माध्यम से यह देखा जाता है कि बजट में दिया गया जनधन उसी योजना पर, सही समय पर और सही तरीके से इस्तेमाल हो रहा है या नहीं। समितियों को प्रशासनिक अधिकारियों को समिति में बुलाने व कारण पूछने का अधिकार है और ऐसा होता भी है। इतना ही नहीं समिति किसी भी योजना को मौके पर अधिकारियों के साथ जाकर निरिक्षण कर सकती है। यदि सदन के सदस्य सतर्कता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व अनुभव के आधार पर अपना दायित्व निर्वाह करें तो कार्यपालिका या प्रशासन के किसी कार्य में कमी की सम्भावना ही नहीं रहेगी। अतः इससे स्पष्ट है कि इन दोनों शाखाओं में सुशासन लाने के लिए विधानमंडल, उनके सदस्य व पीठासीन अधिकारी, कार्यपालिका व प्रशासन की सक्रियता, दायित्वों व सही कार्यप्रणाली पर निर्भर है। विभिन्न संस्थाओं जैसे विधानमंड़लों के पीठासीन अधिकारी, विप्स  आदि के सम्मेलनों में इस तरह के विषय समय-समय पर उठते रहे हैं। वर्ष 2014 में अखिल भारतीय सचेतकों के गोवा सम्मेलन में तो यह भी कहा गया था कि संसदीय संस्थाओं को जनता का विश्वास सुदृढ़ करने के लिए और अधिक सक्रियता के साथ अपने दायित्वों को निभाने की आवष्यकता है।

                                                                      राम नारायण यादव, लेखक (ओथर)

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