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नोटबंदी -सर्जिकल स्ट्राईक आन ब्लैक मनी

December 12, 2016 07:58 PM

नोटबंदी (विमुद्रीकरण) की चर्चा चहुं ओर है। छोटे से लेकर बड़े तक, राजनेता, अभिनेता, समाज का हर वर्ग चाहे अमीर या गरीब सब इस मुद्दे पर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। व्यथित और आहत तो बैंकों की कतार में लगे हैं, पूरा भारत इस निर्णय (सर्जिकल स्ट्राईक आन ब्लैक मनी) से ऐसे हिचकोले खा रहा है, मानो कोई सुनामी आई हो। तरलता का अभाव (कैश) ने सामान्य जनजीवन को रोक सा दिया है। काला धन कितना बाहर आएगा, यह तो समय ही बताएगा, पर भारत का आम व्यक्ति, जो पहले भी काले धन के अंदर होने से दु:खी हो रहा था, अब इस प्रयास की बहुत भारी कीमत चुका रहा है। रोजगार बेरोजगार हो रहा है, उसका पैसा पानी हो गया है। अर्थव्यवस्था उनके लिए, जो हाशिये पर थे, थम सी गई है। डिजिटल इंडिया मोदी का सपना हो सकता है या आईटी कम्पनियों का, पर जमीनी हकीकत यह है कि वित्तीय साक्षरता के अभाव में कैशलैस अर्थव्यवस्था ‘मुंगेरी लाल का हसीन सपना’  प्रतीत होता है। समावेशी अर्थव्यवस्था या ‘सबका साथ-सबका विकास’  आज मात्र खोखला नारा प्रतीत हो रहा है। जिनके पास काला धन था, उन रसूखदारों को तो और भी अच्छा मौका मिल गया है, वह अपने काले धन को बैकों से मिली भगत कर सफेद कर चुके हैं, उसके बदले ईमानदार तथा सामान्य व्यक्ति इतनी असुविधा, परेशानी तथा मानसिक व्यथा से गुजर रहा है। इस तुगलकी फैसले से राजनैतिक फायदा शायद मोदी को उत्तर प्रदेश के चुनावों में मिल भी जाए, पर सामाजिक तथा आर्थिक पैमानों पर यह फैसला दूरगामी परिणाम देगा। कहा जा रहा है कि हिम्मत रखिये थोड़ी परेशानी और असुविधा के बाद अच्छे दिन आएंगे पर पूछो उससे, जिनके घर में इस नोट बंदी की वजह से मौत हो गई हैं, पूछो उससे जिसकी नौकरी चली गई है, पूछो उससे जिसकी दुकान में स्टॉक पड़ा खराब हो रहा है बाजार में खरीददार नहीं है। सैंसक्स बढ़े या घटे, जिसके लिए दो जून रोटी का जुगाड़ मुश्किल है, उसे क्या फर्क पड़ता है, काला धन अंदर रहे या बाहर। अखबार वाले, टी.वी. वाले सब अपने गले फाड़ कर इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। संसद में भी गतिरोध जारी है, पर सवाल अब स्थितियों को संभालने का है, 33 दिन हो गए हैं, 19 दिन बाकी हैं, इस पीड़ा को सहन करने के। ऐसा कहना है, शीर्षस्थ नेताओं का। पर अगर गौर किया जाए हालातों पर तो लगता नहीं है कि छ: महीने से पहले अर्थव्यवस्था की रेल पटरी पर आए। धमकियों और डर उत्पन्न करके कि काला धन जो बैंकों में जमा करवाया है, उसकी पाई-पाई का हिसाब लिया जाएगा, तब भी  शामत आम व्यक्ति की ही आएगी। कानून के हाथ जितने लम्बे हो, लोगों की पहुंच से बाहर होते हैं। बताया जा रहा है। ऐसे अभूतपूर्व निर्णय लेने के लिए नैतिक साहस की जरूरत होती है, पर वह भी किस काम का, जिससे उन लोगों को ही कष्ट पहुंचे, जिनकी खातिर यह निर्णय लिया गया है। काला धन क्यों पैदा होता है, कहां उत्पन्न हो रहा है, क्या सारा काला धन बेईमानी तथा भ्रष्ट तरीकों से उत्पन्न हुआ है? आगे कैसे रोका जाना है? इन सब प्रश्नों का उत्तर दिया जाना चाहिए था। इतना महत्वपूर्ण तथा दूरगामी परिणाम वाला निर्णय- 86 प्रतिशत करैंसी को रद्द किया जाना केवल राजनेताओं द्वारा लिया जाना बिना अर्थशास्त्रियों तथा विशेषज्ञों की सलाह से अपने आप में बहुत कुछ कहता है। आव देखा न ताव पूरी अर्थव्यवस्था को बंधक बना डाला, इस निर्णय ने। अंत: में ये पक्तियां ‘धुंधली हुई दिशायें, छाने लगा कुंहासा, कुचली हुई शिखा से आने लगा धुंआ सा, कोई मुझे बता दे, ये क्या आज हो रहा है, क्यूं हाहाकार मचा है, ये क्या आज हो रहा है’ ।  डॉ. क. कली

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