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Dharam Karam

नवरात्रे - शक्तिपूजन का पर्व

October 04, 2016 11:55 AM

नवरात्रे, सम्पूर्ण भारत में अलग-अलग रूपों में पर्व की तरह मनाए जाते हैं तथा आने वाले त्यौहारों का शंखनाद करते हैं। एक तरफ, इन्हें उत्सवधर्मिता- उत्साह, उमंग, आनंद के साथ मनाया जाता है। जैसे गायन, नृत्य (गरबा विशेषकर), खाने-पीने के बड़े-बड़े अनुष्ठान किये जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ तंत्र-मंत्र साधना करने वाले इन दिनों तप-तपस्या में लीन रहते हैं। नवरात्र- जहां नौ रातें संख्यात्मक तथ्य हैं, वहीं नवरात्रे नवीनीकरण जीवन में नयेपन के संचार को भी इंगित करते हैं। जीवन में नये-नवीन के प्रति आग्रह का प्रतीक है। शरदकालीन नवरात्रे, जहां मौसम में परिवर्तन तथा जीवनशैली में तदनुसार परिवर्तन का उद्घोष करते हैं, वहीं शक्ति के संचय का भी अवसर प्रदान करते हैं। उत्तर भारत में इन दिनों रामलीला तथा राम के जीवन पर आधारित नाटकों का आयोजन किया जाता है। वहीं बंगाल तथा उससे लगते प्रदेशों में दुर्गा पूजा का विशाल पण्डालों में आयोजन किया जाता है। गुजरात इसे अपने गरबा नृत्य तथा रासरंग से मनाता है। दिन में दुर्गा सप्तशती, दुर्गा स्तुति तथा देवी पुराण पर कथा-कीर्तन होते हैं तो रात में ‘जागरण’ कर शक्ति का माँ रूप में गायन-पूजन व वंदन किया जाता है। जीवन के हर क्षेत्र में ‘शक्ति’ का अपना महत्त्व है। शक्ति प्रदर्शन से पूर्व शक्ति अर्जन तथा शक्ति का संचय करना जरूरी है। ये नवरात्रे हमें अपने से जुडऩे, शक्ति चाहे वह सरस्वती के रूप में (ज्ञान), लक्ष्मी के रूप में (धन), का अवसर प्रदान करते हैं। इन दिनों देवी के अलग-अलग रूपों की अलग-अलग विधियों से पूजा की जाती है। आज जब भारत संक्रमण काल से गुजर रहा है, ऐसे समय में जहां चारों ओर परिवर्तन की लहरें उठ रही हैं, उनसे जूझने के लिये सत्ता-शक्ति की आवश्यकता है। चाहे ये परिवर्तन तकनीकी स्तर पर हो या सामरिक और राजनैतिक, सब के जीवन में साकारात्मक प्रभाव हो, इसके लिये नवरात्रों की नये अर्थों में प्रासंगिकता बढ़ जाती है। मात्र परम्पराओं के तौर पर व्रत रखना, गायन-कीर्तन करना, पूजन तथा अनुष्ठान तक इनको सीमित न कर, इन्हें वृहद अर्थों में समझना चाहिए। देवी पुराण में ‘या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्य नमस्तस्य नमो: नम:’ में देवी की जीवन से जुड़े हर पहलू के रूप में पूजा का विधान है। देवी नारी शक्ति को केवल उच्च स्तर पूजनीय स्तर पर केवल नौ दिन ही नहीं बैठाना होता है, अपितु गुणों का जीवन में संचार करना होता है। सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्- जीवन का लक्ष्य बिना शक्ति के प्राप्त नहीं किया जा सकता। आत्मिक शक्ति, सामूहिक शक्ति, राष्ट्रीय शक्ति को कैसे प्राप्त किया जाए, अर्थात शक्ति का अर्जन, संवर्धन तथा उसका रचनात्मक प्रयोग कैसे हो, इससे यह नौ रात्रों का त्यौहार जुड़ा है। सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक अर्थों से जुड़े ये नौ दिन तथा नौ रातें जीवन में कुछ नया करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। जीवन में नये-नये अवसर, जो जीवन में सु:ख, शांति, आनंद का स्रोत बनें, उन्हें खोजना तथा उपयोग करना यही सच्चे अर्थों में नवरात्रे मनाना है।

                                                                                                                     (डॉ० क० 'कली')

 
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