Monday, September 24, 2018
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नारी क्या पहने?

September 02, 2016 06:46 PM

नारी विमर्श या नारी स्वतंत्रता अथवा नारी के सम्मान तथा सुरक्षा की चर्चा जोरों-शोरों से चल रही है। विवाद नारी के पहनावे को लेकर शुरू हुई। पूरे विश्व में इस सम्बन्ध में की गई टिप्पणियों पर चर्चा जारी है। सामाजिक न्याय तथा समानता के पैरोकार इसे अपने-अपने ढंग से इसे मूल्यांकित कर रहे हैं। हमारे देश में पर्यटन तथा संस्कृति मन्त्रालय के मंत्री महेश शर्मा द्वारा किया गया कमेंट या यूं कहिये कि सलाह भारत में पर्यटन पर आने वाली महिलाएं छोटी स्कर्ट इत्यादि न पहने। अर्थात जिनका उत्तरदायित्व पर्यटकों की सुरक्षा तथा सम्मान का है, वही उन्हें भारत में आने पर कैसे वस्त्र पहने की सलाह दे रहे हैं। एक तरफ मोदी जी व उनकी सरकार टूरिज्म नॉट टैरररिज्म की बात कर रही है, पर्यटन जो रोजगार तथा आर्थिक विकास की सम्भावनाओं भरा क्षेत्र है, विदेशी पर्यटकों के लिये भार आकर्षक स्थल है, उन पर भी अपनी संकीर्ण सोच थोपना कहां तक उचित है? पहले से ही विदेशी महिलाएं सुरक्षा की दृष्टि से हमारे देश में आने से डरती हैं। इस प्रकार के बयान इस स्थिति को और भी जटिल बना देते हैं। यह एक विडम्बना है कि आर्थिक विकास का माडल तो आप पाश्चात्य देशों का अपनाना चाहते हो, पर संस्कृति अपनी थोपना चाहते हो। यह बात भारतीय नारी पर भी थोपी जाती है। सांस्कृतिक विकास तथा मूल्य, परिवेश से पनपते हैं। वैश्विक संस्कृति का एक और उदाहरण बुर्कानी- बुर्का जो कि मुस्लिम देशों की नारी का पहनावा है, बिकनी जो कि यूरोपियन देशों में पहनी जाती है, उन दोनों को मिलाकर नयी डै्रस है। इसको पहनने पर इटली के मंत्री जी का बयान तथा इटली के मंत्री की टिप्पणी दोनों ही संकुचित गंतव्य का प्रतीक है तथा इसे नारी स्वतंत्रता पर आघात के तौर पर देखा जा रहा है। नारी क्या पहने, यह उसका चुनाव है। मुस्लिम धार्मिक नेता जब नारी को बुर्के से ढकने या बुर्का पहनने पर जोर देते हैं। उसे दकियानूसी तथा स्वतंत्रता हनन माना जाता है। वही गलती होगी यदि यूरोपियन महिलाओं को केवल बिकनी पहनने को कहा जाए तथा बुर्कानी का विरोध के लिये आग्रह किया जाए। पहरावा, परिवेश से उत्पन्न होता है। सांस्कृतिक तथा सामाजिक मूल्य भी परिवेश तथा वहां की जलवायु तथा मौसम के अनुरूप ढलते हैं। अरेबियन देशों से रेगिस्तान गर्मी तथा रेतीली हवाओं से बचने के लिये पुरूष व स्त्री दोनों के लिये सिर से पांव तक ढकने वाली ड्रैस ईजान हुई। इसी तरह पाश्चात्य ठंडे मुल्कों में सूर्य की किरणों का शरीर पर सीधा प्रभाव लेने के लिये शरीर पर कम से कम वस्त्र जैसे कि बिकनी अस्तित्व में आयी। आज जब सूचना क्रांति तथा इंटरनैट ने पूरे विश्व को एक ग्लोबल विलेज बना दिया है तो सांस्कृतिक मेलजोल से नये सांस्कृतिक मूल्यों का आविर्भाव स्वाभाविक है। नए पहरावे का इसलिये विरोध करना कि यह मुस्लिम पहरावा है या फिर विदेशी महिलाएं पर्यटक जब भारत में आए तो स्कर्ट इत्यादि टांगों को दिखाने वाली ड्रैस न पहनें। नारी स्वतंत्रता तथा उसकी चुनाव की क्षमता पर प्रश्रचिह्न लगाना है। पुरूष सदियों से नारी को निर्देशित करता रहा है कि वो क्या पहने तथा क्या न पहने। आज समय आ गया है कि नारी स्वयं समर्थ है तथा सक्षम है कि वो निर्णय ले कि वो क्या पहने व क्या न पहने? राजनेता जिनका दायित्व है कि नारी सुरक्षा तथा सम्मान का वातावरण बनाए। पर वही राजनेता ही उसकी स्वतंत्रता तथा समझ का हरण करने में सबसे आगे है।

(डॉ० क० 'कली')

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