हरियाणा

एक दिन की बरसात-गुरुग्राम की साख

July 30, 2016 10:42 PM
 
गुरुग्राम मिलेनियम सिटी, आई.टी. सिटी या पुराना नाम गुडग़ांवा, एक छोटी सी बरसात को भी सहन नहीं कर सका और सब जगह हाय-तौबा मची रही। प्रशासन को जी-भर कौसते रहे लोग तथा सरकार की नाकामी और अव्यवस्था के कसीदे पढ़ते रहे। सोशल मीडिया-ट्विटर, यू-टयूब, फेसबुक, वाट्सअप सब पूरी गति से भरसक प्रयोग किये गये, ये जताने के लिए कि जाम में फंसे लोग कितनी असुविधा तथा दु:खी महसूस कर रहे हैं। बाहर से आए लोगों में जिनमें से कोई सिंगापुर से था या आस्टे्रलिया से आए हुए थे, शहर छोड़ जाने की धमकी दे रहे थे तथा इतनी अव्यवस्था, इतनी परेशानी जीवन में उन्हें कभी सोची भी नहीं थी। सरकार को कर देने वाले तथा समाज में सुनवाई रखने वाले ये लोग चंडीगढ़ में स्थित सरकार तथा अफसरशाही को तंद्रा तथा नींद से उठाने में तो कामयाब हो गए, पर प्राकृतिक आपदा या इस मानवीकृत आपदा के समय सरकार असहाय दिखी। प्रश्न अव्यवस्था तथा गैर प्रबन्धी का तो है ही पर पूछा यह जाना चाहिए कि क्या यह बरसे पानी का उत्पात सिर्फ गुरुग्राम में ही हुआ या जाम सिर्फ यहीं पहली बार लगा। अक्सर, हम सुनते हैं कि- बादल फट गया, इतने गांव जलमगन हो गए, जान-माल को इतना नुकसान हुआ, पर क्या उसी संवेदनशीलता तथा तत्परता से क्या मीडिया तथा सरकार हरकत में आते हैं तथा आम व्यक्ति की दुविधा तथा दु:ख और परिस्थितियों के सामने असहायता का वर्णन सुनने या देखने में मिलता है? बंगाल, बिहार तथा असम आए दिन बाढ़ से प्रभावित लोगों तथा क्षेत्रों की कठिनाईयों के बारे में खबरें आती है, वहां भी जिंदगी थम सी जाती है, पर गुरुग्राम में बरसात के उत्पात तथा उससे उपजे ट्रैफिक जाम ने हमारे शहरीकरण तथा स्मार्ट सिटी की पोल तो खोली ही विकास का जो माडल, हमने चुना है, उस पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। भू-माफिया तथा बिल्डर्स कैसे, शहर में पानी के निकासी के लिए बने नाले व छोटे पतनाला पर भी कब्जा कर लेते हैं, उसका ही यह दुष्परिणाम देखने को मिला। दशकों के विकास तथा निर्माण को खतरे में डाल देते हैं। विश्व मानचित्र पर गुरुग्राम ने अपना अस्तित्व बनाने में जो आधी सदी की मेहनत की थी, मशक्कत की थी, उस पर एक दिन की असुविधा व परेशानी भारी पड़ गई। नये, धनाडय वर्ग, जो गुरुग्राम का वासी है, जिसकी सुनवाई सत्ता के गलियारों में भी है, जो अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। क्या उन्होंने कभी अपने दायित्वों के बारे में भी सोचा, जापान में इतनी बड़ी सुनामी आती हैं, चीन में बड़ी-बड़ी बाढ़ें आती हैं, अमेरिका केभी शहर प्राकृतिक प्रकोप से थम जाते हैं, जान-माल का नुकसान होता है पर क्या इतनी हाय-तौबा मच जाती है? भारत में तो अक्सर एक तरफ देश के किसी हिस्से में सूखा तथा अन्य क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित होते रहते हैं। एफडीआई या विदेशी निवेश की तरह, वैश्विक कम्पनियां तथा उसके बशिंदे भी सदा चलायमान रहते हैं, अगर व्यवस्था उनके अनुरूप नहीं हुई तो कब रूख दूसरी तरफ कर ले, कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। यहां लोगों की परेशानी दु:ख तथा असुविधा को कम आंकने का मकसद नहीं है, पर यह विचारणीय है कि जिस तरह शहरीकरण तथा विकास के तरीके तथा नीतियां, अपनाई जा रही हैं, वह कितनी खोखली तथा क्षणिक हैं, संपन्नता तथा आर्थिक विकास के जो माडल अम्ल में लाए जा रहे हैं, क्या वह सबके सर्वजन सुखाय: सर्वजन हिताय: हैं या नहीं, जिन थोड़े लोगों को ये आर्थिक उदारीकरण के लाभ हो भी रहे हैं। वे कैसे थोड़ी सी परेशानी व असुविधा के चलते, व्यवस्था की चूले हिला सकते हैं। सरकार की नाकामी कुप्रबंधन अव्यवस्था की पोल तो खुली ही है पर गुरुग्राम की साख जो देश की राजधानी का सबसे आकर्षक सैटलाईट शहर है, उसकी साख पर बट्टा लगा है। अन्त में ‘‘गिरे तो यूं फिसलते चले गए, हमें पता न था कि इतनी ढलान है।’’
डॉ० क. कली

 

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