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राष्ट्रीय

सातवां वेतन आयोग-कर्मचारी बेचारा

July 03, 2016 06:51 AM

 सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सरकार के फैसले की प्रतिक्रिया कई रूपों में आ रही है, कर्मचारी संघ इससे असंतुष्ट हैं तथा हड़ताल करने की धमकी दे रहे हैं तो सरकार इसे ऐतिहासिक बता, कर्मचारियों से वाहवाही की उम्मीद कर रही है।

        ब्रेक्सिट के बाद डौलते भारतीय बाजार को सम्भालने हेतु सरकार ने यह पिटारा खोला तथा बाजार ने थोड़ा साकारात्मक रूख किया है। उपभोग प्रेरित विकास की भावना जगी है, क्योंकि अंततः एक कर्मचारी उपभोक्ता ही है। उसकी क्रयशक्ति बढ़ने से बाजार में रौनक लौटने की उम्मीद है, क्योंकि जब तक उसे बढ़े हुए वेतन तथा बकाया एरियर्स मिलेंगे, तब तक त्यौहारों का मौसम आ चुका होगा। लेकिन प्रश्न यह है कि सरकारी कर्मचारी केवल उपभोक्ता ही है, उत्पादक नहीं है। उसके कार्य तथा प्रतिफल में कोई सम्बन्ध नहीं है। जैसे कि सरकार तथा मीडिया इसे बता तथा जता रहा है जैसे सरकारी कर्मचारियों को तोहफा, बोनान्जा या फिर सरकारी कर्मचारियों की चांदी जैसी हैडलाइन्ज क्या सिद्ध करती है। जैसे सरकार खैरात बांट रही हो या मुफ्त में सबसिडीज दे रही हो। एक तरफ कल्याणकारी सरकारें मॉडल नियोक्ता होने का दावा करती है अर्थात सरकारी क्षेत्र में कर्मचारियों को जो वेतन, सुविधाएं देती है, निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को भी, नियोक्ता उसी अनुरूप उनको सेवाआें के बदले में वेतन-भत्ते इत्यादि देंगे। पर उल्टी गंगा बह रही है। सरकार अपने कैबिनेट स्तर के सचिवों को भी उतना वेतन नहीं दे पाती, जितना बड़ी-बड़ी कम्पनियों के सीईओ जैसे कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट इत्यादि की तो बात ही न करो। निजी क्षेत्र की कम्पनियां भारत में ही जितना वेतन दे रही हैं, उच्च स्तर के कर्मचारियों को वेतन इस दृष्टि से सातवें वेतन आयोग ने बढ़ाने की सिफारिश की है तथा निम्नस्तर जैसे कि सरकारी ड्राइवर या सरकारी अध्यापक जिन्हें निजी क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम मिलता है, उनका सरकारी क्षेत्र में भी वेतन ज्यादा नहीं बढ़ाया गया है। सरकार पर, इस वेतना आयोग को लागू करने पर इतना वित्तीय बोझ बढ़ेगा, वित्तीय घाटा बढ़ जाएगा। ऐसे-ऐसे तर्क देकर कर्मचारियों को जो उनका हक बनता है, उससे वंचित किया जा रहा है। सरकार अपनी छवि सुधारने के लिये करोड़ों रुपये खर्च करती है, लेकिन उसका सबसे बड़ा ब्रांड एम्बेसेडर तो सरकारी कर्मचारी है। उसको देने में कंजूसी करती है, जबकि कहने को पब्लिक सरवेंट जैसे कि एमएलए, एमपी अपने वेतन, भत्ते तथा पेंशन सब बढ़ाते रहते हैं, उन्हें तो 10 वर्ष के लिये किसी वेतन आयोग का भी इंतजार नहीं करना पड़ता। अभी राज्यसभा में जो 57 नए सदस्य आए हैं, उनमें 55 सदस्य करोड़पति हैं। ऐसे सदस्यों के लिये वेतन-भत्ते क्या मायने रखते हैं। निःसंदेह सरकारी कर्मचारी की कार्यकुशलता, कार्यक्षमता ताि उसकी जवाबदेही का प्रावधान होना चाहिए, पर उसको उसकी जिम्मेदारी तथा खून पसीने के अनुरूप पैसा भी मिलना चाहिए। निजी क्षेत्र में चुनिंदा लोगों को बहुत बड़ा पे-पैकेज़-मुआवजा मिलता है तथा ज्यादातर लोगों को कम पैसा दिया जाता है तथा उनका शोषण किया जाता है। सरकारी क्षेत्र में ी ऐसे होने लगेगा तो पहले से ही प्रतिभा तथा टैलेंट के अभाव से जूझ रही सरकारें अच्छे तथा दक्ष कर्मचारी जुटा ही नहीं पाएगी। सरकारी क्षेत्र, भ्रष्टाचार (कर्मचारियों) से परिपूर्ण हैं, क्यों? निजी क्षेत्र के लोग उसके पास जो विवेकीय शक्ति (Discretionary Powers) होती है, उसे प्रभावित करने के लिए पैसा फैंकते हैं। यह एक मकड़जाल की तरह है तथा सभी इसमें फंसे हैं। सरकारी नौकरी किसी ज़माने में समाज में ऊपर उठने का-upward mobility का साधन थी, पर अब ऐसा नहीं है। नैतिकता तथा ईमानदारी की डोर से बंधा कर्मचारी चाहे वह प्रथम श्रेणी का ही क्यों न हो, मुश्किल से ही अपना जीवन स्तर बनाए रखता है तथा जीवनयापन कर पाता है, क्योंकि समाज बदल रहा है, जरूरतें बढ़ती जा रही हैं, शिक्षा तथा स्वास्थ्य निरंतर आम आदमी की पहुंच से बाहर जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात, कर्मचारी की तो सारी आय सफेद होती है, वह कर की चोरी नहीं कर सकता, हां यहां मैं केवल उस वेतन की बात कर रही हूं, जो कागजों में वेतन आयोग ने बढ़ाने का फैसला लिया है तथा सरकार उसे कार्यान्वन करने जा रही है। सरकारी कर्मचारी की उत्पादकता तथा कार्यकुशलता बढ़नी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है, पर जिस तरह से सरकारी भर्तियां आज होती है, जिनकी संख्या भी दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है वह किसी से छिपा नहीं है। वैश्वीकरण के चलते, ब्रेन डै्रन की समस्या बढ़ने ही वाली है। पर दुविधा तथा दुःख की बात यह है कि भारत में तो निजी क्षेत्र भी उतना संगठित नहीं है, जितना कि अन्य विश्व की अर्थव्यवस्थाओं में है। यदि इसी तरह चलता रहा वह दिन दूर नहीं, जब करियाने की दुकान पर नौकरी करना और सरकारी नौकरी करना प्राय: बन जाएगा।

 

डॉ क.कली

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