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प्रधानमंत्री मुद्रा योजना - नई बोतल में पुरानी शराब

June 01, 2016 06:51 PM

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, वर्तमान सरकार के आर्थिक विकास तथा रोजगार सृजन सम्बन्धी कार्यक्रमों जैसे कि मेक इन इण्डिया, डिजिटल इण्डिया, स्टार्ट अप एण्ड स्टैंड अप इण्डिया के तहत उद्यमियों को वित्त उपलब्ध करवाने से सम्बन्धित है। इस योजना के तहत तीन तरह के ऋण उद्यमियों तथा व्यावसायियों को दिये जाते हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना- शिशु, जिसमें 50,000 रुपये तक ऋण, किशोर ऋण जोकि 50,000 रुपये से 5 लाख रुपये तक तथा तरूण ऋण, जिसमें 5 लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक ऋण की व्यवस्था है। शिशु, किशोर तथा तरूण अवस्था का सम्बन्ध नए उद्योग तथा व्यवसाय के शुरू करने, उन्हें आगे बढ़ाने तथा अपने पैरों पर खड़े होने तक की व्यवस्था का प्रावधान है। नए उद्यमियों तथा कुशल कारीगरों को अपना व्यवसाय शुरू करने में सबसे बड़ी दिक्कत पूंजी तथा वित्त सम्बन्धी होती है। सरकार इस कार्यक्रम द्वारा इस कठिनाई को दूर करने की सोच रही है। प्रधानमंत्री ने अपने वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिये गए साक्षात्कार में भी इस बारे में अपना मन्तव्य स्पष्ट किया कि वे भारत में फार्म तथा फर्म (कृषि तथा व्यवसाय) के अतिरिक्त तीसरे क्षेत्र, जिसे उन्होंने पर्सनल सैक्टर कहा, पर ज्यादा बल देगी। अर्थात स्वरोजगार तथा उद्यमशीलता, जिसमें युवा भारतीय नौकरी मांगने वाले नहीं, नौकरी देने वाले बन जाएंगे। इनोवेशन तथा टैक्नोलोजी के सहारे भारत में नव औद्योगीकरण का सपना देखा जा रहा है। सरकार इकोसिस्टम बदलने की बात कर रही है, जिसमें मिडल मैन मुक्त भारत तथा ब्यूरोक्रेसी मुक्त भारत की बात भी हो रही है। प्रश्न यह है कि ये सब कुछ नया हो रहा है या नई बोतलों में पुरानी शराब की तरह है। सरकार ने प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के अन्तर्गत पिछले साल लगभग 1.25 ट्रिलियन रुपये का ऋण बांटा तथा इसे अपनी उपलब्धि तथा योजना की सफलता के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन क्या यह पीछे आर्थिक सुधरों से पूर्व पिछली सरकारों द्वारा लगाए गए ऋण मेला से क्या भिन्न हैं ? महज धन की व्यवस्था कर देना या ऋण का वितरण, टारगेट पूरे करना विकास के लिये कितना कारगर है, यह संदेहास्पद है। भारतीय बैंकिंग व्यवस्था पहले ही खस्ता हालत में है। जन-धन योजना तथा अब यह प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, क्या भारतीय बैंकिंग व्यवस्था को अंदर से खोखला तो नहीं कर रही? छोटे उद्योग व कुटीर उद्योग देश की अर्थव्यवस्था के लिये रीढ़ की हड्डी की तरह होते हैं। उन्हें हरसम्भव सहायता की जानी चाहिए। आज जब सरकारी नौकरियां घट रही हैं, तो यह स्थान छोटे उद्योग जोकि संगठित क्षेत्र में हो, रोजगार सृजन में अपना योगदान दे सकते हैं। परंतु पम्पिंग ऑफ फण्ड्स से केवल उद्योग न तो शुरू हो पाएगा और न ही लम्बे समय तक अपने अस्तित्व में रहेंगे। आवश्यकता है सरकार को अपनी उपलब्धियों को महज टारगेट पूरे करने तथा आंकड़ों में सफलता प्राप्त करने की बजाय जमीनी हकीकत देखनी चाहिए। इतने फण्ड्स, इतना बजट हमने इस योजना के लिये रखा, इतना खर्च कर दिया, यह कोई विकास तथा सफलता को मापने का तरीका नहीं है। सरकार को चाहिए कि सोची-समझी नेक इरादे से शुरू की गई योजना वास्तव में कार्यान्वित की जाए तथा अमलीजामा पहनाने के साथ यह भी देखा जाए कि उसके एच्छिक परिणाम जैसे कि उत्पादन बढ़ाना, रोजगार बढऩा, आय बढऩा, इस दृष्टि से इनको जांचा जाना जरूरी है।

(डॉ० क० ‘कली’)

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